Thursday, 26 March 2015

पड़ोस की साँवली लड़की

रसोई में जब मेरी माँ का हाथ बटाती हो,
न जाने मुझे ऐसा क्यों लगता है के 
तुम मुझ पर अपना हक़ जताती हो 

नज़रें उठा के देखा न मुझसे बात की कभी,
पर दिल कहता है की मेरा हाल लेने ही
रोज बहाने से मेरे घर आती हो 

झुकी हुई डरी डरी आँखे ये तुम्हारी,
दिल में दबी चाहा आँखों से छलकेगी
ये सोच के आजकल सबसे नज़रे चुराती हो 

दबा दबा सा रंग रूप ना जुल्फे ही रेशमी है,
पर मासूम उम्मीदों की दो बूँद 
अपनी आहटों से छलका मेरे घर को महकाती हो 

तेरे असर से रातों में चांदनी का रंग कुछ और है 
शायद चाँद के चहरे पे भी लिपटा हुआ 
तेरे दुप्पट्टे का छोर है

-पुलस्त्य