Thursday, 23 October 2014

दिया और तम

दीवाली की रात, एक दिया 
पगडण्डी के अँधेरे छोर पे 
देर तक जलता रहा........
उन्माद में बेसुध हवाओं के
थपेड़े रह रह पड़ते रहे, और
दिया तम से लड़ता रहा....

वजूद की गर्मी मे जिस्म जला
नाजुक सी लौ बार - बार
गिरती रही संभलती रही.....
सहमी सी सर झुका के कभी
और कभी पलट हवाओं को 
ललकार के, जलती रही......

भौर में जब सांस थमने लगी 
तो भी तम के सीने पे वज्रा चला गया....
बुझता हुआ दिया चैन से हंस कर 
अपने अंश से सूरज को सुलगा गया.... 

-पुलस्त्य

मुश्किल

उसने हमें भुला भी दिया होगा अब तक किसी न किसी बहाने से 
उससे खफा हो कर हमने उसकी ये मुश्किल भी आसान कर दी ।  

-पुलस्त्य

ईश्क़

ईश्क़ मैं गुजर हुई कुछ इस तरहा
झुलसी हुई रात, चाँद जलता हुआ,
और जो कभी सहर हुई भी अगर ..
एक ग़ुब्बार थी उठता हुआ ।

इबादत न  दीन-ओ-ईमान रहा
होश हवास न अब वो इंसान रहा,
हस हस के कहती दुनिया 'दीवाना'
सो रह गया इक नाम, तेरा दिया हुआ।

-पुलस्त्य

Sunday, 14 September 2014

आँखे

तेरी आँखो के असर की ये तासीर है,
दो शीशों मे नुमाया मेरी तक़दीर है.....
क़ैद में हूँ इनकी सियाह गहराइयों में,
काजल मे ढली मेरे पँाव की जंज़ीर है ।

-पुलस्त्य

पीरी

छज्जा उदास है कल से। पड़ती धूप का रंग बता रहा है। गुनगुना सुनहरी रंग जलता हुआ संतरी हो गया है। गरमी में जैसे स्याह पड़ गया हो। मंद हवा जिस रोशनदान से बहकर बांसुरी की लय पकड़ लेती थी अब जैसे चोट खा कर कहराह रही है। बदलते मौसम का असर है शायद । 

पर, मौसम तो हर बार बदलता है ये उदासी पहले नहीं देखी। ये उदासी साथी के खोने की लगती है। कई दिन से बेसुरा पंछी नहीं आया है। गीत जो रोज गाता था, नहीं गाया है। न जाने कितने बरसों से नन्हा हर रोज दाना चुगने आता है, गीत गाता, कुछ वक़्त िबताता, उड़ जाता है। कर्कश अावाज में न जाने क्या गाता, पर छज्जे को जिन्दा होने का अहसास करा जाता है।  

हर सुबह छज्जा उम्मीद भरी निगाहों से मुझे देखने लगता। और जब मैं अन्न के कुछ दाने छज्जे पर बिखेर देता तो फिर वही उम्मीद भरी नज़रें आसमान की ओर उठ जातीं। बेख़बर पंछी आता, दाना चुगता, गाता, और उड़ जाता । फिर देर तक छज्जे पर एक सुकून भरी शान्ति रहती, के जैसे दिन का एक सबसे जरूरी काम निबटा कर कोई ऊंघता हो, नये कल की तयारी में।

हफ्ते भर पहले ही इस उम्मीद पे रंग आया था जब पंछी अपने नये साथी को लाया था। एक और नन्हा पंछी, चंचल, कर्कश, जिन्दा। दोनों देर तक चौंच लड़ाते रहे। बंजर जमीन पे जैसे बेल फूट आई थी; छज्जे में भी बगिया बनने की चहा भर आई थी। लेकिन, फिर उस रोज से जोड़े ने मुड कर नहीं देखा, शायद नये साथी को मुंडेर नहीं भाई थी। छज्जा बूढा जो हो गया है। मेरी तरह!

इस से पहले भी उम्मीदे तो टूटी कई हैं, पर तोड़ने से पहले उम्मीद को दोगुना करने की ये रीत नयी है।

उम्र, बढ़ कर, एक दौर में जिस्म को पत्थर कर देती है। तब धड़कन की आवाज़ सुनने के लिए भी किसी और के दिल की जरुरत पड़ती है। चेहरा स्याह, जिस्म सुन्न, ढूंढता जिन्दा होने का अहसास है। शायद इसी लिए छज्जा उदास है।  


-पुलस्त्य

ईश्क़ का असर

ईश्क़ के असर से कायनात चलाता हूँ मै....
गर्म सांसो से सूरज को हवा देता हूँ .....
ग़म की बदली से पोंछकर चाँद चमकाता हूँ मै....

-पुलस्त्य

रात



सूरज से रूठ कर 
आधा रोज 
कालिख मल
मुह फिराए बैठा है ।

-पुलस्त्य

अमावस्या

अमावस्या की काली अँधेरी रातों मे,
ये सोचकर
दिल को आराम मिलता है, 
के छुप कर,
कहीं किसी और दुनिया मे..
मेरे चाँद से फलक का चाँद मिलता है ।

फिर हर रात,
तिल-तिल बढ़ते चाँद को....
उम्मीद भरी
बेचैन निगाहों से तकते रहते हैं
तब कहीं....
पूरनमासी को चाँद की आँखों मे..
अपने रूठे महबूब की एक झलक पातें है ।

-पुलस्त्य

Wednesday, 27 August 2014

शहादत

नक्श पैने है उनके, जैसे खंजर की धार
नैयनन काजल रेखा, मानो तेज तलवार
मुड़ - मुड़ यूँ देखना, सधे तीरों का वार
दिल वाले खूब लड़ें, पर होती उनकी हार 
कर जिगर चाक मेरा, हुस्नवाले अबकी बार ।

-पुलस्त्य






  

.....

राह नहीं, मंजिल नहीं, कोई उम्मीद भी नहीं,
दिल भुला धड़कना बस साँस चलती जाती है,
अब मौत से ही पूछे कोई मेरे जीने का सबब, 
अरसा हुआ जिंदगी तो नज़रें फिराए बैठी है ।

-पुलस्त्य
    

Saturday, 9 August 2014

प्यास

मज़ा तो इस प्यास  में है  शराब में कहाँ  ....
दो घूँट पीता हूँ इस उम्मीद में, प्यास की इंतिहा छूने के लिए 
शायद फिर जगे एक नयी प्यास कुछ और देर जीने के लिए ।

-पुलस्त्य

तू

तू क्या है ? कुछ भी तो नहीं ! 
तू घटा नहीं, तू हवा नहीं, तू फ़िज़ा भी नहीं,
ये सब तो मेरे ख़्याल हैं । इस दिल का बुना हुआ वबाल हैं ।

इन आँखों में है तो तू एक ख्वाब है !
जुस्तजु है मेरी साँसों में, तो नाम तेरा गुलाब है,
न लड़खड़ाएं ये कदम मेरे अगर, तो तु कहाँ की शराब है ।

मेरी दीवानगी पे मेरा बसर नहीं !
जवानी के दौर में शायद, सुकून-ऐ-दिल मयसर नहीं,
न उछले रगों में मेरा लहू तो, तू वो शय है जिसमे  कोई असर नहीं ।

मेरे जूनून ही से उठी तेरी रानाई है,
मेरी बंदगी के असर ही से क़ायम तेरी खुदाई है 
न लूटा एक जरा सी बात पर, फ़क़त मेरा ईश्क़ ही बस तेरी कमाई है ।

-पुलस्त्य


वबाल- Problem
जुस्तजु- Desire
बसर- Control
रानाई- Beauty 
बंदगी- Devotion 

Wednesday, 30 July 2014

गुज़र

तेरे ईश्क़ में गुज़र हुई कुछ इस तरहा 
सुलगती रही हर रात चाँद जलता रहा, 
सूरज एक राख़ का ढेर बनके रह गया 
सुबह एक ग़ुब्बार थी जैसे चढ़ता हुआ ।

-पुलस्त्य

रोज़गार




बैठा हूँ तेरा आइना हाथों में थामकर 
जुल्फों में तेरी गुलाब सहेजता हूँ मैं,
तू मत पूछ मुझसे मेरे रोजगार की..
आजकल, चाँद को दिखाता हूँ आईना
और फूलों को फूल भेजता हूँ मैं ।
  
-पुलस्त्य
  

नूर

दूरियां हैं तुम में मुझ में, तो चाँद लगती हो तुम 
होती अगर करीब तो दिल का सुरूर हो जाती,
ढूंढता रहता हूँ आसमान में रौशनी का सुराग 
होती तुम करीब तो इन आँखों का नूर हो जाती ।

-पुलस्त्य

Monday, 14 July 2014

रूप तेरा, इश्क़ मेरा !


  
फूलों का रंग 
हवा की तरंग
मेघो की मस्ती 
दिल की उमंग
बनती है तब,

मिलते हैं जब 
रूप तेरा, इश्क़ मेरा !

चंदा से शीतल 
भंवरे सी चंचल 
मधुर बांसुरी सी
बजती है हर पल
होते है जब,

इक दूजे के संग 
रूप तेरा, इश्क़ मेरा !

उमंगो की रवानी 
दरिया का पानी 
कोरे दुपट्टे का
कच्चा रंग धानी 
चढ़ते हैं तब,

मिलते हैं जब 
रूप तेरा, इश्क़ मेरा !

  
-पुलस्त्य





Saturday, 5 July 2014

नैना

मैं इनको देखूँ, होश उड़े हैं
जो न देखूँ रुके है धड़कन,
रहे सलामत ये बैरी नैना,
बने रहें मेरी जाँ के दुश्मन ।

-पुलस्त्य

राख़

गुजरे पलों की राख़ के ढेर को,
उगली से कुरेदता हूँ मैं....
के शायद कोई पल अध-जला रह गया हो !
उस पल में कोइ अहसास बचा रह गया हो !

मेरे आंसूंओं मे भीग तेरी यादें,
स्याही सी फैल गयी हैं....
के जैसे अहसास खो गया गुमाँ रह गया हो !
जलने को कुछ बचा नहीं धुँआँ रह गया हो !

ये तुझे पाने की ना-उमीदी,
और जीने का सफर....
के मंजिल लुट गयी और रास्ता रह गया हो !
खुदा झुठा पर अजान से वास्ता रह गया हो !

-पुलस्त्य

Sunday, 22 June 2014

असर

अरसा हुआ के तू जुदा हो गयी 
पर हर रात शायद नींद में तेरा नाम लेता हूँ मै,
खून छलक आता है खुश्क लबों पे 
और रिसते लहुँ को तेरा बोसा मान लेता हूँ मै,
आज भी वो ही असर है तेरा मुझ पे
मेरी बर्बादियों के इशारे से ये जान लेता हूँ मै,
जली मिलती हैं उंगलिया उस सवेरे 
ख्वाब मैं जिस रात हाथ तेरा थाम लेता हूँ मै ।

-पुलस्त्य

चाँद और आशिक

चंदा और आिशक की तासीर एक है
हर रात यूँ जलना फिर राख हो जाना़ .....
दोनों की तक़दीर एक है ।

दोनो उठाते हैं जुनूँ की तोहमत 
और दाग़ अगर दामन क़े जो देखें तो ..... 
दोनों की तस्वीर एक है ।

ये  आसमानो में है
और उसका भी रुतबा है बहोत 
गौर से अगर देखे 
दोनों क़े पांव में ज़ंजीर एक है

-पुलस्त्य
  

Tuesday, 3 June 2014

याद

तुझको याद मैं इस तरह कर रहा हूँ 
के क़तरा क़तरा हर रोज  मर रहा हूँ,
तेरी यादों के मज़ार पर, बिना नागा 
टुकड़ो में खुद को अदा कर रहा हूँ  ।

हर रात मौत की परी ख्वाब में आती है
ले आगोश में ग़म मिटाने को लुभाती है
न जीना पड़े बेबसी के और चार दिन
अब तो हर दम यही दुआ कर रहा हूँ ।

-पुलस्त्य
   

Sunday, 18 May 2014

याद

तुझसे दूरी मुझे अब एक नए अंदाज में तड़पाती है,
भूलने लगा हूँ तेरा चेहरा, पर तू बहुत याद आती है ।
बोल याद नहीं, बस एक तेरा लहजा है ख्याल में, 
सूखी दरिया जमीं पे जैसे एक लकीर छोड जाती है ।

-पुलस्त्य

Saturday, 10 May 2014

ख़्वाब

तुम क्यूँ ख्वाब में आती हों.....
सँवारता हूँ जिन जख़्मो को 
अपने आंसूंओं के पानी से,
उनको फिर नोच जाती हों ।
तुम क्यूँ ख्वाब में आती हों.....
तेरा ईश्क़ जिंदगी था मेरी
तू नहीं तो मौत की उम्मीद है,
ख़्वाबों में यूँ आ - आ कर
अपने होने का अहसास दिला
उस उम्मीद को तोड़ जाती हों ।
तुम क्यूँ ख्वाब में आती हों.....

-पुलस्त्य

Sunday, 4 May 2014

अहसान

खुदा ने जब तुझको बनाया होगा
अपना बेहतरीन हिस्सा तुझमे लगाया होगा,
तेरी आँखों में है उसी की नर्मी
तेरा ये हुस्न उसके ही रूप का साया होगा ।

सूरज के सोने से तेरा तन गढ़ा होगा 
कुछ रंग गुलाबों का भी उसमे मिलाया होगा,
लचकती इस शाख-ए-बदन को तेरी
महकती पुरवाइयों में होले-होले तपाया होगा ।

घटाओं को बना के तेरे सर का ताज
तेरी मखमल सी नरम जुल्फों में सजाया होगा,
रख तारो जड़ा फलक तेरे माथे पे 
पूनम के चाँद को माथे की बिंदिया बनाया होगा ।

एक टक तुझे देख कर
टुकड़ा अपने दिल का तेरी मूरत में बिठाया होगा,
उठ बैठी होगे लेकर अंगड़ाई तू 
तो खुदा को मतलब इश्क़ का समझ आया होगा,
होगा अहसान खुदा पर किसी जमीं वाले का
उसकी खातिर तराश तुझे जमीं पे भिजवाया होगा।  

-पुलस्त्य

Sunday, 27 April 2014

शिक्षा

बातों में अब वो बात नज़र नहीं आती,
अब कहीं कोइ आग नज़र नहीं आती,
तालिमयाफ्ता लपटें हैं नए ज़माने की,
चमकती हैं पर, आंच नज़र नहीं आती ।

उगने लगे है जंगल भी अब कतारों मैं,
खिलते हैं बस फूल गुलाब ही बहारों मैं,
कीकर, बबुल और बेर नज़र नहीं आती,
बेपरवाह, अमर बेल नज़र नहीं  आती ।

अब कायदा सब सीख गए अदब का,
मतलब कोई नहीं पूछता किसी सबक का,
ग़ालिब को सोचने पे जो मजबूर कर दे,
बेअदबी की वो आवाज नज़र नहीं आती ।

-पुलस्त्य

Thursday, 24 April 2014

तेरा ग़म

मत पूछ क्यों मेरी आँखों मे नमी है,
तेरा गम सलामत मुझे क्या कमी है ।

ये दिल धड़कता रहेगा तेरी याद मे,
नब्ज का क्या फिर थमी है तो थमी है ।

-पुलस्त्य

आग

सुबहो जलती है, शाम जलती है,
दिल में कोई आग, दिन तमाम जलती है ।

काग़ज़ी ख्वाब हैं, मोम की हैं हसरतें,
इस बेबसी की आग में दोनो, कमाल जलती हैं ।

महबूब की देन है, है दोस्तों का प्यार,
के जिक्र-ए-वफ़ा में अब मेरी, जुबान जलती है ।

लुट गयी महफ़िल, मिट गए परवाने,
सहरी तक दो पल और बस, शमा बेजान जलती है ।

दिल एक अंगार है, लावा है रगों मे,
एक लाश चिता मे जैसे, पुरआराम जलती हैं ।

-पुलस्त्य

Saturday, 19 April 2014

रात

रह रह ग़म के झोंके चलते रहे, 
हर पल यादों के कांटे चुभते रहे, 
और मैं फूल सी मुस्कुराती रहीं,  
रात भर आपकी याद आती रही ।

फलक पे एक खेल सा चलता रहा,
बनके तेरा चेहरा चाँद छलता रहा,
नरम चांदनी भी तन जलाती रही,
रात भर आपकी याद आती रही ।  

हर आहट एक उम्मीद जगाती रही,
मेरी ही परछाई मुझको सताती रही ,
तेरे साये सी मुझसे लिपट जाती रही,
रात भर आपकी याद आती रही ।

दिल की आतिश मंद हो ना जाये कहीं,
एक भी आंसू आँख से गिरने ना दिया,
आंधी में सूखी पत्ती सी फड़फड़ाती रही,
रात भर आपकी याद आती रही ।

-पुलस्त्य

( A tribute to 'Faiz' and 'Makhdoom')

Monday, 14 April 2014

your touch

Tender touch of fingertips on my chest
Your breath is still burning my neck,
Sweating in my arms are you 
Like gold, washed in morning dew,
I am touching the contours of your body 
Hesitant and greedy, and yet
Two bodies flamed by one desire 
Purified, after burning in relentless fire.

Even with closed eyes I feel, next to me, your limitless expanse 
As if a lush valley wrapped in transparent sunlight 
descending on a barren stretch,
In its bosom lies the eternal calm, 
beside the rivers flowing down like your full arms,
Your hair, cool and fragrant like morning showers
Make a stone breathe with their revitalising powers.

- Pulastya 

Sunday, 13 April 2014

प्रेम स्पर्श


सीने पर तेरी उँगलियों की छुअन.....
तेरी सांसो की गर्मी से झुलसती गर्दन,
पसीने मे भीगी यूँ मेरी बाँहों मे समायी हो 
सोने की कोई मूरत जैसे औस मे नहाई हो ।
कांपते हाथों से ऐसे छूता हूँ आकार को तेरे,
जैसे दरिद्र के हाथों मे जहाँ की दौलत थमाई हो ।
एक ही अरमान मे जलते हुए दो तन कुछ देर मे पाक हो जायेंगे,
प्रेम की अग्नि मे जलाकर जैसे भभूती की राख बनायीं हो ।।

बंद आँखों की दरारों मे झांकता है मुझसे लिपटा तेरा विस्तार.....
सुबह की झिनी धूंप को पहने कोई वादी जैसे सहरा मे उतर आई हो,
जिसके उरोज़ो के साये मे आकर जहाँन भर का चैन बसता है
जिसके पैरों को तरंग देने को नदियां बहाई हो । 
तेरी जुल्फों की घटाओं के साये मैं कुछ देर जी लेगा ये मरू भी 
के तेरी खैरात से जैसे सहरा की किस्मत भी सवर आई हो ।।

-पुलस्त्य

Saturday, 12 April 2014

तू

कई रोज से इक खुशबु मुझे दीवाना बना रही है,
तेरे तन की डाँली गुलाब बनी है शायद ।

नरम सुबह सी मासूमियत है रोशनी मैं दिनभर,
सूरज पर, तेरे बदन के सोने की परत चढ़ी है शायद ।

इस कदर तो मदहोश करती नहीं थी ये हवाएँ,
अब इनमे तेरे होठों की नमी मिली है शायद ।

ये गुरूर चांदनी की फितरत मे नया-नया है,
बनके बिंदिया तेरे माथे सजी है शायद ।

बेरोक ये तेरे दीदार की दयानतदारी हम पर,
 तू नयी-नयी खुदा बनी है शायद ।

बहुत दिनों बाद है ये गर्मजोशी, ये जलसे का आलम,
फिर किसी आशिक की चिता सजी है शायद ।

-पुलस्त्य

Sunday, 6 April 2014

शराब


यूं तो पानी ठहरा !
तेरे हुस्न कि रंगत, मेरे जिगर का लहूँ
करते हैं रंग सुनहरा शराब का ।

कोई कैसे बतायें !
गुनाह है या ता-उम्र जलने का इनाम है?
ये प्याला शराब का ।

गम के मारो से 
हर शब मिलने आती है दो कतरे जिंदगी,
भेष बदल कर शराब का ।

लहू में दोनों हैं मगर!
मय उदास है और दर्द पर बहार है,
तेरे असर पे, बेअसर होना शराब का ।

खुदा भी सिमट गया कुरान में !
लेकिन, ख्याम-मीरओ-बच्चन से कितने आये 
हुआ नहीं मुक्कमल बयां शराब का ।

-पुलस्त्य


Monday, 24 March 2014

फूल


शाम को महका रहा है गज़रा ,
जु़ल्फों में सजा है, पयाम फूलों का ।

लाती है संदेसे बाद-ए-सबा,
हर सांस लेती है, सलाम फूलों का ।

अब तक ताजगी बनी हुई है हवाओ में,
हुआ था ज़िक्र यहाँ, इक शाम फूलों का ।

इसमें रंग हैं, खुश्बू है, और प्यार ही प्यार,
किस्सा है ये कुछ, बेनाम फूलों का ।

मेरे गीतों कि मस्तीयां, तेरी शोखियों का रंग,
सब हैं, गुलाम फूलों का ।

बच्चों कि किलकारी, माओं कि दुआएं,
है सच्चा, बयान फूलों का ।

तेरा यक-ब-यक लिपट जाना मुझसे,
जैसे मुझको, एक इनाम फूलों का ।

बिखरी उम्मीदे, कुचले हुए अरमाँ,
हुआ है, क़त्ल-ए-आम फूलों का ।

अब बिछड़े तो आसमानो मे मिलेंगे,
है तारो में, एक मक़ाम फूलों का ।

(ये बात तुमने छेड़ी थी 'मख़दूम',
हम भी साथ हो लिए जब हुआ, बयान फूलों का)*

-पुलस्त्य

*This is a tribute to  Makhdoom Mohiuddin for his famous Ghazal -फिर छिड़ी रात बात फूलों की.

बाद-ए-सबा- morning breeze 
पयाम- message 
कलाम-message









  

Thursday, 20 March 2014

जिस्म

तेरे गुदाज़ बदन कि सौंधी खुश्बू वो जुनूँ लाती है,
मिट्टी के तेरे जिस्म में मुझे खुदाई नज़र आती है ।

बेवज़ह ही नहीं चूमता फिरता कोई पत्थरों को !
रूह-ए-ईश्क़ तेरे जिस्म के काबे में बसर पाती है ?

दुनिया कहे दीवाना परवाह नहीं है मुझको ...,
तू क्यूँ मुझ पर इल्जाम बुतपरस्ती का लगाती है?

कुछ और नहीं ये, मेरी इबादत कि इंतहा के सिवाय 
जो हर पल मुझे तुझसे लिपट जाने को उकसाती है ।   

-पुलस्त्य

होली

हल्का सा नशा हो जाता है
फर्क नहीं रहता चेहरो में
हर चेहरा एक रंग में फ़ना हो जाता है
रूप, रंग, जात, धर्म सब छिप जाते हैं इन रंगो के पीछे,
प्रहर भर को आदम, आदम नहीं रहता इंसां हो जाता है,
चेहरो का ये रंग क्यूँ समां नहीं जाता आँखों में 
होली का त्यौहार क्यूँ हर रोज नहीं आता है?

-पुलस्त्य
   

Sunday, 9 March 2014

इश्क़

मैं शायर हूँ मेरा क्या है !

मेरी आँख का आंसू धड़कन से रवानी लेकर 
एक नज़्म बनेगा और कागज पर उभर आयेगा,
चूम लूंगा आँखों से उसकी नज़ाकत को 
और कभी ये मन उसके अल्फांजों से लिपट जायेगा,
चंद शेर पढूंगा और 
आँखों में तेरा चेहरा उभर आयेगा ।
तेरी यादों से तुझे तराश कर 
बसा लूँगा एक नज़्मो कि किताब में,
और वीरान रातों में उसको सीने से लगा कर
तेरे रूबरू होने सा सुकूं आयेगा ।

और तू ! 

छुप छुप के रोयेगी   
जागेगी रात रात भर
दामन भिगोएगी,
मेरा चेहरा तेरी यादों से धुल भी जाये शायद...
तेरे दिल कि आतिश को बुझा सके
आंसूं इतने कहाँ से लाएगी ।  

-पुलस्त्य

Sunday, 23 February 2014

अहसास

हम नहीं पीते 
ये लर्ज़िश दी हुई तुम्हारी है,
जब तू बांहों में थी
ये उन पलों कि खु़मारी है,
अब और रहने दे
इस हाँ-हाँ नहीं-नहीं को,
तेरा तो खेल हुआ
आफत में जान हमारी है,
मर जायेंगे तेरी ना से 
और दुनिया से कह जायेंगे,
मेरे क़ातिल पे रहम, मगर 
जानम हमको जान से प्यारी है ।

मैं जानता हूँ कि 
वो नहीं उठकर चलने वाले,
अपने आशियाँ के 
सुकुं से नहीं निकलने वाले,
मेरी दीवानगी से 
उनका तो बस इतना नाता होगा
कि, आईने के सामने
इतराने का सबब मिल जाता होगा,
मेरी आह सुनते है तो
अपने हुस्न पे रह रह गुरुर आता होगा,
मेरी तड़प से मेरा क़ातिल
अपनी ताक़त का अंदाजा लगाता होगा ।
  
'अहसास, है
नाम तेरा, लबों पे ना लायेंगे
बस दिल ही दिल में
दुआओं में बार-बार दोहराएंगे,
करेंगें जुर्म जो तुम कहो
फिर जो सजा भी दोगी, निभाएंगे,
इनायत कि ना सही 
पर अपनी नज़र ना हटाना हमसे 
फिर क्या के हम पर
गर्दिशों के दौर यूँ ही चलते जायेंगे,
परवाह नहीं के वो
याद भी रखेंगे हमें कि भूलेगे
इतना कहेंगे उनसे
जब हम नहीं होंगे तो बहुत याद आयेंगे ।  

-पुलस्त्य

लर्ज़िश-लड़खडाहट

रात

रात जब आती है 
अजीब सा सुकून लाती है..

सूरज कि रोशनी 
हम निरहो से 
हमारी ओट छीन लेती है
होले से आ कर 
दिन भर के थके हारों को

अंधेरे कि चादर में छिपाती है

रात जब आती है 
अजीब सा सुकून लाती है.. 

दिन भर लड़ते लड़ते 
जीने कि दुश्वारिओं से 
इतने शौक से पाले हुए ग़म 
कहीं खो से जाते हैं 

फिर उनसे मिलाती है

रात जब आती है 
अजीब सा सुकून लाती है..

गहरा सन्नाटा इतना कि 
खुद का अहसास नहीं होता
गम सीने से लगा रहता है 
और दर्द नहीं होता
जिस्म पिंघल जाता है
बस एक सोच तैरती रहती है  

रात जब आती है 
अजीब सा सुकून लाती है..  

दो पल आँख लगे तो 
ख्वाब मैं भी तू बिछड़ने लगे तो
बस एक बुरा सपना है
ये सोच कर तेरे होने का 
यकीं बना रहता है,
दिल की चोट पर झूंठ भी
मरहम के काम आती है

रात जब आती है 
अजीब सा सुकून लाती है..  
  
-पुलस्त्य

Saturday, 15 February 2014

इश्क़

कुछ ऐसी मेरी तक़दीर है,
तेरे पैर कि बेड़ी
मेरे हाथ कि लकीर है

हशर देख मेरा तू कभी,
लहू सब आँख से टपक गया 
अब रग़ों मे बहती पीर है

दिल को मत आजमा तू,
आया तो आशिक़ 
रूठा तो फ़क़ीर है

तेरे लिए गुनाह सही,
तुझसे मुहोब्बत मगर 
मेरी रूह है मेरा जमीर है  

-पुलस्त्य

Sunday, 2 February 2014

दो नैना

जबसे तेरे नैना दो पैमाने हो गए
दिन रात झूमते हैं पीने वाले, 
और वीरान 
शहर के सारे मैख़ाने हो गए ।

ये जोश, ये जज्बा, ये आलमे जुनून,
शराब में नहीं, जो बात तुझमे है 
के बेखुदी छोड़ 
मयकश सारे, परवाने हो गए ।

अब न मयकदे कि वो बेरोशनी राह
ना साकी का तल्ख़ इन्तज़ार,
शराब बन चांदनी बरसी, 
अंदाज चाँद के साकियाने हो गए ।  

दिल ही में खिचती है दो घूँट
बैठते हैं जब तेरा चेहरा आँखों में उतार कर,
जबसे तुझे खुदा बनाया
जलवे शराब के रूहानी हो गए ।

यूँ ही पिलाती रहना इन आँखों से
वरना ता-उम्र की तौबा,
पी जबसे कोहेनूरी प्यालो में
कच्ची मिट्टी के बाक़ी पैमाने हो गए ।

-पुलस्त्य

  

Saturday, 1 February 2014

असर

होठो से तुम होठ लगा दो
इस बुझती रात को 
फिर सुलगा दो,
छू भर लो बस हाथ बढ़ा के   
नरम चाँद को 
आफताब बना दो ।

-पुलस्त्य


Sunday, 19 January 2014

कोई

नज़र कि रेशमी डोर से 
दूर से,एक महीन छोर से 
बांध कर रखती हो मुझे,
कभी नजदीक आती नहीं...

दबी -दबी एक मुस्कान से 
उम्मीद बो कर मेरे दिल में 
झुकी-झुकी सोज़ नज़रों कि
कनखियों से इसे सींचती हो,
पर कभी कुछ कहती नही...

क्या करोगी जब 
दी हुई उम्मीद पर बहार आयेगी 
तेरे रंग में रंगे फूल खिलेंगे मेरी आँखों मे, 
मुझमे से 
तेरी महकती खुश्बू आयेगी ।

क्या करोगी जब 
जमी ख्वाइशे पिघल के बरसेगीं
और तेरे नूर कि बूंदे
मेरे चहरे की रौनक़ मे उभर आएंगी ।

लाख जतन करो तुम 
छुपी न रह सकोगी,
मेरे चहरे कि खिली रंगत से ही 
दुनिया तो समझ जायेगी ।

-पुलस्त्य

   

Sunday, 12 January 2014

रात

दिन ढले  ही से चलती 
बेचैन तेज हवाओं ने 
रात कि काली जुल्फों
को बिखेर दिया है........
रात के बालों में सजी 
सितारों कि लड़ियां
बिखरी हुई लटों में
कहीं खो गयी हैं
और मखमली दूब में छिपे हुए
जुगनुओं सी
रोशनी का हल्का हल्का सुराग 
छोड़ रही हैं..........
कुछ सांवले बादल 
रात के माथे के टीके चाँद को
बार बार आकर अपने पीछे छिपा लेते हैं, 
और फिर थोड़ी देर के लिये 
बिलकुल चुपचाप खड़े हो जाते हैं।
उनसे छनती रौशनी 
शैतान बच्चो के चेहरे कि दबी दबी सी
हसी जैसी लगती है.......

-पुलस्त्य
  

Friday, 10 January 2014

मैं

कई बार कोशिश की । 
अपना परिचय खुद से कराने की ,
कौन हूँ मै! ये समझ पाने की ।

औरों के मनदर्पण मैं खुद को देखा ,
तो पाया की मन का आइना अक्स नहीं दिखाता ,
तर्जुमा करता है । 

रंग, रूप, जात, धर्म में रंगा तर्जुमा,
आशा, उम्मीद, प्यार,नफरत में बंधा तर्जुमा ।

शख्शियत एक, गोया हर आदमी का अपना अलग तर्जुमा । 
मै, शायद, इन्ही तर्जुमो की गुथी हुई ऐसे माला हूँ जिसमे हर मिलने वाला एक और बीज पिरो जाता है । 

माला कभी पूरी नहीं होती । 
और मेरी खुदी, माला की डोर जैसी, 
कहीं छिप के रह जाती है, 
जिसका अहसास तो होता है पर दिखाई नहीं देती ।

-पुलस्त्य

अक्स- Image
तर्जुमा- Translation 
शख्शियत- Personality 
खुदी- Self 

Wednesday, 8 January 2014

तुम

बताओ तो कैसी हो तुम ?

कि कुछ ढ़ल गयी हो,
या वो ही
पूनम के पूरे 
चाँद जैसी हो तुम।

याद दिल से जाती नहीं!

ख्याल मैहकते हैं मेरे,
हर शाम 
दिल में बयार बनके 
बहती हो तुम।

तुम चाहे कुछ न बोलो  ! 

मैं तो सुनता हूँ कनबतियाँ
रोज़ तुम्हारी, 
पत्तियों की सरसराहट में
रहती हो तुम।

उफ़ ये तेरे होने का अहसास!

तकता रहता हूँ
कांधे को मेरे,
क़े जैसे 
सर रखके सोती हो तुम।

भूलती नहीं वो नजदीकियां!  

बेख्याल चूमता रहता हूँ 
हथेली अपनी,
यूंं लगता है
हाथ कि रेखा हो तुम। 

कभी उदास ना होना प्रिये!

दिल डूबता है
इस ख़्याल से,
कि मेरे आंसुओ में
छिपके रोती हो तुम। 

-पुलस्त्य


बयार- Pleasant fragrant wind 
कनबतियाँ- something said in the ear

Tuesday, 7 January 2014

खुदा

हमको खुदा बना दिया,
छीनके हमसे कू-ए-यार
एक आयत 
में बसा दिया।

डर से खुलने के राजे दिल,
दिल से निकाल कर
मंदिर 
में सजा दिया।

लगे ना ख्वाइशों कि तोहमत
इसलिए तूने,
नूर-ए-ईश्क को
नूर-ए-ईलाही बता दिया।

दिखाये ख्वाब संगमर्मरी,
फिर धड़कते दिल को
हज्र-ए-अस्वद
बना दिया।

जहाँ से सुनाई ना दें
मेरी आहें भी
मुझको इस कदर
ऊँचा उठा दिया।

छुपाने को अपनी तंगदिली 
मेरे मेहबूब ने
स्वांग 
खुदा का रचा दिया। 

-पुलस्त्य

कू-ए-यार - महबूब की गली
आयत      -इस्लाम के धार्मिक ग्रन्थ क़ुरान की सबसे छोटी ईकाई (verses)
हज्र-ए-अस्वद-The Black Stone in the eastern corner of the   Kaaba, symbolising something which is respected but not loved.
नूर-ए-ईश्क- glow of love
नूर-ए-ईलाही- glow of god 





Saturday, 4 January 2014

दर्द

इस दर्द को पहचानता हूँ ़़़़़़मैं ...
किस नस से उठेगा
किस रग में बसेगा
जानता हूँ मैं।

इन आँखों ने शरारत की...
इस दिल की हरारत को
अब इन्हीं के पानी से
उतारता हूँ मैं।

होती नहीं इस मर्ज कि दवा...
पल भर सुकुं पाने को 
रह रह बस नाम तेरा 
पुकारता हूँ मैं।

इतना दर्द सीने में समाऐ कैसे...
हौसला बढ़ाने को
दर्द है तो खुदा भी है
मानता हूँ मैं।

-पुलस्त्य 

हरारत- Fever 
नस   - Nerve
रग    - Vein

मैं /आप

तुमने छुआ 'मै' जलके राख हो गया 
ना दर्द, ना दाग और पाक हो गया,
दिया तूने क्या नशा इस बेखुदी में
'मै' कुछ बचा नहीं सब 'आप' हो गया ।

-पुलस्त्य