गुजरे पलों की राख़ के ढेर को,
उगली से कुरेदता हूँ मैं....
के शायद कोई पल अध-जला रह गया हो !
उस पल में कोइ अहसास बचा रह गया हो !
मेरे आंसूंओं मे भीग तेरी यादें,
स्याही सी फैल गयी हैं....
के जैसे अहसास खो गया गुमाँ रह गया हो !
जलने को कुछ बचा नहीं धुँआँ रह गया हो !
ये तुझे पाने की ना-उमीदी,
और जीने का सफर....
के मंजिल लुट गयी और रास्ता रह गया हो !
खुदा झुठा पर अजान से वास्ता रह गया हो !
-पुलस्त्य
उगली से कुरेदता हूँ मैं....
के शायद कोई पल अध-जला रह गया हो !
उस पल में कोइ अहसास बचा रह गया हो !
मेरे आंसूंओं मे भीग तेरी यादें,
स्याही सी फैल गयी हैं....
के जैसे अहसास खो गया गुमाँ रह गया हो !
जलने को कुछ बचा नहीं धुँआँ रह गया हो !
ये तुझे पाने की ना-उमीदी,
और जीने का सफर....
के मंजिल लुट गयी और रास्ता रह गया हो !
खुदा झुठा पर अजान से वास्ता रह गया हो !
-पुलस्त्य
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