Sunday, 14 September 2014

आँखे

तेरी आँखो के असर की ये तासीर है,
दो शीशों मे नुमाया मेरी तक़दीर है.....
क़ैद में हूँ इनकी सियाह गहराइयों में,
काजल मे ढली मेरे पँाव की जंज़ीर है ।

-पुलस्त्य

पीरी

छज्जा उदास है कल से। पड़ती धूप का रंग बता रहा है। गुनगुना सुनहरी रंग जलता हुआ संतरी हो गया है। गरमी में जैसे स्याह पड़ गया हो। मंद हवा जिस रोशनदान से बहकर बांसुरी की लय पकड़ लेती थी अब जैसे चोट खा कर कहराह रही है। बदलते मौसम का असर है शायद । 

पर, मौसम तो हर बार बदलता है ये उदासी पहले नहीं देखी। ये उदासी साथी के खोने की लगती है। कई दिन से बेसुरा पंछी नहीं आया है। गीत जो रोज गाता था, नहीं गाया है। न जाने कितने बरसों से नन्हा हर रोज दाना चुगने आता है, गीत गाता, कुछ वक़्त िबताता, उड़ जाता है। कर्कश अावाज में न जाने क्या गाता, पर छज्जे को जिन्दा होने का अहसास करा जाता है।  

हर सुबह छज्जा उम्मीद भरी निगाहों से मुझे देखने लगता। और जब मैं अन्न के कुछ दाने छज्जे पर बिखेर देता तो फिर वही उम्मीद भरी नज़रें आसमान की ओर उठ जातीं। बेख़बर पंछी आता, दाना चुगता, गाता, और उड़ जाता । फिर देर तक छज्जे पर एक सुकून भरी शान्ति रहती, के जैसे दिन का एक सबसे जरूरी काम निबटा कर कोई ऊंघता हो, नये कल की तयारी में।

हफ्ते भर पहले ही इस उम्मीद पे रंग आया था जब पंछी अपने नये साथी को लाया था। एक और नन्हा पंछी, चंचल, कर्कश, जिन्दा। दोनों देर तक चौंच लड़ाते रहे। बंजर जमीन पे जैसे बेल फूट आई थी; छज्जे में भी बगिया बनने की चहा भर आई थी। लेकिन, फिर उस रोज से जोड़े ने मुड कर नहीं देखा, शायद नये साथी को मुंडेर नहीं भाई थी। छज्जा बूढा जो हो गया है। मेरी तरह!

इस से पहले भी उम्मीदे तो टूटी कई हैं, पर तोड़ने से पहले उम्मीद को दोगुना करने की ये रीत नयी है।

उम्र, बढ़ कर, एक दौर में जिस्म को पत्थर कर देती है। तब धड़कन की आवाज़ सुनने के लिए भी किसी और के दिल की जरुरत पड़ती है। चेहरा स्याह, जिस्म सुन्न, ढूंढता जिन्दा होने का अहसास है। शायद इसी लिए छज्जा उदास है।  


-पुलस्त्य

ईश्क़ का असर

ईश्क़ के असर से कायनात चलाता हूँ मै....
गर्म सांसो से सूरज को हवा देता हूँ .....
ग़म की बदली से पोंछकर चाँद चमकाता हूँ मै....

-पुलस्त्य

रात



सूरज से रूठ कर 
आधा रोज 
कालिख मल
मुह फिराए बैठा है ।

-पुलस्त्य

अमावस्या

अमावस्या की काली अँधेरी रातों मे,
ये सोचकर
दिल को आराम मिलता है, 
के छुप कर,
कहीं किसी और दुनिया मे..
मेरे चाँद से फलक का चाँद मिलता है ।

फिर हर रात,
तिल-तिल बढ़ते चाँद को....
उम्मीद भरी
बेचैन निगाहों से तकते रहते हैं
तब कहीं....
पूरनमासी को चाँद की आँखों मे..
अपने रूठे महबूब की एक झलक पातें है ।

-पुलस्त्य