अमावस्या की काली अँधेरी रातों मे,
ये सोचकर
दिल को आराम मिलता है,
के छुप कर,
कहीं किसी और दुनिया मे..
मेरे चाँद से फलक का चाँद मिलता है ।
फिर हर रात,
तिल-तिल बढ़ते चाँद को....
उम्मीद भरी
बेचैन निगाहों से तकते रहते हैं
तब कहीं....
पूरनमासी को चाँद की आँखों मे..
अपने रूठे महबूब की एक झलक पातें है ।
-पुलस्त्य
ये सोचकर
दिल को आराम मिलता है,
के छुप कर,
कहीं किसी और दुनिया मे..
मेरे चाँद से फलक का चाँद मिलता है ।
फिर हर रात,
तिल-तिल बढ़ते चाँद को....
उम्मीद भरी
बेचैन निगाहों से तकते रहते हैं
तब कहीं....
पूरनमासी को चाँद की आँखों मे..
अपने रूठे महबूब की एक झलक पातें है ।
-पुलस्त्य
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