Sunday, 14 September 2014

अमावस्या

अमावस्या की काली अँधेरी रातों मे,
ये सोचकर
दिल को आराम मिलता है, 
के छुप कर,
कहीं किसी और दुनिया मे..
मेरे चाँद से फलक का चाँद मिलता है ।

फिर हर रात,
तिल-तिल बढ़ते चाँद को....
उम्मीद भरी
बेचैन निगाहों से तकते रहते हैं
तब कहीं....
पूरनमासी को चाँद की आँखों मे..
अपने रूठे महबूब की एक झलक पातें है ।

-पुलस्त्य

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