Thursday, 23 October 2014

दिया और तम

दीवाली की रात, एक दिया 
पगडण्डी के अँधेरे छोर पे 
देर तक जलता रहा........
उन्माद में बेसुध हवाओं के
थपेड़े रह रह पड़ते रहे, और
दिया तम से लड़ता रहा....

वजूद की गर्मी मे जिस्म जला
नाजुक सी लौ बार - बार
गिरती रही संभलती रही.....
सहमी सी सर झुका के कभी
और कभी पलट हवाओं को 
ललकार के, जलती रही......

भौर में जब सांस थमने लगी 
तो भी तम के सीने पे वज्रा चला गया....
बुझता हुआ दिया चैन से हंस कर 
अपने अंश से सूरज को सुलगा गया.... 

-पुलस्त्य

मुश्किल

उसने हमें भुला भी दिया होगा अब तक किसी न किसी बहाने से 
उससे खफा हो कर हमने उसकी ये मुश्किल भी आसान कर दी ।  

-पुलस्त्य

ईश्क़

ईश्क़ मैं गुजर हुई कुछ इस तरहा
झुलसी हुई रात, चाँद जलता हुआ,
और जो कभी सहर हुई भी अगर ..
एक ग़ुब्बार थी उठता हुआ ।

इबादत न  दीन-ओ-ईमान रहा
होश हवास न अब वो इंसान रहा,
हस हस के कहती दुनिया 'दीवाना'
सो रह गया इक नाम, तेरा दिया हुआ।

-पुलस्त्य