Wednesday, 30 July 2014

गुज़र

तेरे ईश्क़ में गुज़र हुई कुछ इस तरहा 
सुलगती रही हर रात चाँद जलता रहा, 
सूरज एक राख़ का ढेर बनके रह गया 
सुबह एक ग़ुब्बार थी जैसे चढ़ता हुआ ।

-पुलस्त्य

रोज़गार




बैठा हूँ तेरा आइना हाथों में थामकर 
जुल्फों में तेरी गुलाब सहेजता हूँ मैं,
तू मत पूछ मुझसे मेरे रोजगार की..
आजकल, चाँद को दिखाता हूँ आईना
और फूलों को फूल भेजता हूँ मैं ।
  
-पुलस्त्य
  

नूर

दूरियां हैं तुम में मुझ में, तो चाँद लगती हो तुम 
होती अगर करीब तो दिल का सुरूर हो जाती,
ढूंढता रहता हूँ आसमान में रौशनी का सुराग 
होती तुम करीब तो इन आँखों का नूर हो जाती ।

-पुलस्त्य

Monday, 14 July 2014

रूप तेरा, इश्क़ मेरा !


  
फूलों का रंग 
हवा की तरंग
मेघो की मस्ती 
दिल की उमंग
बनती है तब,

मिलते हैं जब 
रूप तेरा, इश्क़ मेरा !

चंदा से शीतल 
भंवरे सी चंचल 
मधुर बांसुरी सी
बजती है हर पल
होते है जब,

इक दूजे के संग 
रूप तेरा, इश्क़ मेरा !

उमंगो की रवानी 
दरिया का पानी 
कोरे दुपट्टे का
कच्चा रंग धानी 
चढ़ते हैं तब,

मिलते हैं जब 
रूप तेरा, इश्क़ मेरा !

  
-पुलस्त्य





Saturday, 5 July 2014

नैना

मैं इनको देखूँ, होश उड़े हैं
जो न देखूँ रुके है धड़कन,
रहे सलामत ये बैरी नैना,
बने रहें मेरी जाँ के दुश्मन ।

-पुलस्त्य

राख़

गुजरे पलों की राख़ के ढेर को,
उगली से कुरेदता हूँ मैं....
के शायद कोई पल अध-जला रह गया हो !
उस पल में कोइ अहसास बचा रह गया हो !

मेरे आंसूंओं मे भीग तेरी यादें,
स्याही सी फैल गयी हैं....
के जैसे अहसास खो गया गुमाँ रह गया हो !
जलने को कुछ बचा नहीं धुँआँ रह गया हो !

ये तुझे पाने की ना-उमीदी,
और जीने का सफर....
के मंजिल लुट गयी और रास्ता रह गया हो !
खुदा झुठा पर अजान से वास्ता रह गया हो !

-पुलस्त्य