तेरे ईश्क़ में गुज़र हुई कुछ इस तरहा
सुलगती रही हर रात चाँद जलता रहा,
सूरज एक राख़ का ढेर बनके रह गया
सुबह एक ग़ुब्बार थी जैसे चढ़ता हुआ ।
-पुलस्त्य
सुलगती रही हर रात चाँद जलता रहा,
सूरज एक राख़ का ढेर बनके रह गया
सुबह एक ग़ुब्बार थी जैसे चढ़ता हुआ ।
-पुलस्त्य