Friday, 27 January 2017

ख़ुशबू

लोग कहते हैं
मेरे अल्फ़ाज़ों से ऐक खूशबू सी आती है.....
कैसे बताऊँ
तेरे बदन के सोने में ढली है कविता मेरी.....

-पुलस्त्य

ख़्वाब

गर तू बस ऐक ख़्वाब थी
जो मैंने कभी देखा है........
तो फिर मैं ये कैसे बताऊँ
के मेरी हथेली पे
ये तेरी चूड़ी का टुकड़ा है
या हाथ की रेखा है?.......

-पुलस्त्य

हद

हर बार, तेरी अनदेखी जब हद से गुज़रने लगी,
टूटते दिल की कराहों से मेरी रूह भी डरने लगी,
तो इस ऐक ख़्याल से दिल को बहला लिया मैंने
तेरी तोहमतों के पैरों के निशाँ को ही
आँखों से लगा लिया मैंने,
के शायद तुम मगरूर नहीं, बस मेरी चाहत की हद ढूँढ रही हो..........

और ये गुनाह मेरे दिल का है
की मेरी मोहब्बत मेरे दिल की गहराइयों में जन्मी है,
तुम मेरे ईश्क़ की गरमी को
अपनी ऊँगलियों से  छूँ कर परख सको
इसके ख़ातिर, मेरे दिल का टुकड़ों में टूटना लाज़िमी है...........

-पुलस्त्य

शहर

तंग गलियों में उफनता सरों का सैलाब
शहर की रगों में लहू बनके दौड़ता था कभी........
अब जमने लगा है ।

कैन्सर जैसी भीड़ मौत बन पनप रही है
थके हुऐ शहर की रवानगी को निगल रही है........
अब ये शहर मरने लगा है ।

-पुलस्त्य

क्या होगा

हाय होंठों पे सुलगती रहे प्यास,  पीने में वरना मज़ा क्या होगा,
हांसिल तो ये के मौत हमसफ़र है, जीने में वरना मज़ा क्या होगा,
बस हर ऐक घड़ी साँस लेना ही नहीं होता किसीका ज़िन्दा होना,
शबो-रोज़ घुटते रहें यूँ ही अरमाँ, सीने में वरना मज़ा क्या होगा।

--पुलस्त्य