शाम को महका रहा है गज़रा ,
जु़ल्फों में सजा है, पयाम फूलों का ।
लाती है संदेसे बाद-ए-सबा,
हर सांस लेती है, सलाम फूलों का ।
अब तक ताजगी बनी हुई है हवाओ में,
हुआ था ज़िक्र यहाँ, इक शाम फूलों का ।
इसमें रंग हैं, खुश्बू है, और प्यार ही प्यार,
किस्सा है ये कुछ, बेनाम फूलों का ।
मेरे गीतों कि मस्तीयां, तेरी शोखियों का रंग,
सब हैं, गुलाम फूलों का ।
बच्चों कि किलकारी, माओं कि दुआएं,
है सच्चा, बयान फूलों का ।
तेरा यक-ब-यक लिपट जाना मुझसे,
जैसे मुझको, एक इनाम फूलों का ।
बिखरी उम्मीदे, कुचले हुए अरमाँ,
हुआ है, क़त्ल-ए-आम फूलों का ।
अब बिछड़े तो आसमानो मे मिलेंगे,
है तारो में, एक मक़ाम फूलों का ।
(ये बात तुमने छेड़ी थी 'मख़दूम',
हम भी साथ हो लिए जब हुआ, बयान फूलों का)*
-पुलस्त्य
*This is a tribute to Makhdoom Mohiuddin for his famous Ghazal -फिर छिड़ी रात बात फूलों की.
बाद-ए-सबा- morning breeze
पयाम- message
कलाम-message