Monday, 24 March 2014

फूल


शाम को महका रहा है गज़रा ,
जु़ल्फों में सजा है, पयाम फूलों का ।

लाती है संदेसे बाद-ए-सबा,
हर सांस लेती है, सलाम फूलों का ।

अब तक ताजगी बनी हुई है हवाओ में,
हुआ था ज़िक्र यहाँ, इक शाम फूलों का ।

इसमें रंग हैं, खुश्बू है, और प्यार ही प्यार,
किस्सा है ये कुछ, बेनाम फूलों का ।

मेरे गीतों कि मस्तीयां, तेरी शोखियों का रंग,
सब हैं, गुलाम फूलों का ।

बच्चों कि किलकारी, माओं कि दुआएं,
है सच्चा, बयान फूलों का ।

तेरा यक-ब-यक लिपट जाना मुझसे,
जैसे मुझको, एक इनाम फूलों का ।

बिखरी उम्मीदे, कुचले हुए अरमाँ,
हुआ है, क़त्ल-ए-आम फूलों का ।

अब बिछड़े तो आसमानो मे मिलेंगे,
है तारो में, एक मक़ाम फूलों का ।

(ये बात तुमने छेड़ी थी 'मख़दूम',
हम भी साथ हो लिए जब हुआ, बयान फूलों का)*

-पुलस्त्य

*This is a tribute to  Makhdoom Mohiuddin for his famous Ghazal -फिर छिड़ी रात बात फूलों की.

बाद-ए-सबा- morning breeze 
पयाम- message 
कलाम-message









  

Thursday, 20 March 2014

जिस्म

तेरे गुदाज़ बदन कि सौंधी खुश्बू वो जुनूँ लाती है,
मिट्टी के तेरे जिस्म में मुझे खुदाई नज़र आती है ।

बेवज़ह ही नहीं चूमता फिरता कोई पत्थरों को !
रूह-ए-ईश्क़ तेरे जिस्म के काबे में बसर पाती है ?

दुनिया कहे दीवाना परवाह नहीं है मुझको ...,
तू क्यूँ मुझ पर इल्जाम बुतपरस्ती का लगाती है?

कुछ और नहीं ये, मेरी इबादत कि इंतहा के सिवाय 
जो हर पल मुझे तुझसे लिपट जाने को उकसाती है ।   

-पुलस्त्य

होली

हल्का सा नशा हो जाता है
फर्क नहीं रहता चेहरो में
हर चेहरा एक रंग में फ़ना हो जाता है
रूप, रंग, जात, धर्म सब छिप जाते हैं इन रंगो के पीछे,
प्रहर भर को आदम, आदम नहीं रहता इंसां हो जाता है,
चेहरो का ये रंग क्यूँ समां नहीं जाता आँखों में 
होली का त्यौहार क्यूँ हर रोज नहीं आता है?

-पुलस्त्य
   

Sunday, 9 March 2014

इश्क़

मैं शायर हूँ मेरा क्या है !

मेरी आँख का आंसू धड़कन से रवानी लेकर 
एक नज़्म बनेगा और कागज पर उभर आयेगा,
चूम लूंगा आँखों से उसकी नज़ाकत को 
और कभी ये मन उसके अल्फांजों से लिपट जायेगा,
चंद शेर पढूंगा और 
आँखों में तेरा चेहरा उभर आयेगा ।
तेरी यादों से तुझे तराश कर 
बसा लूँगा एक नज़्मो कि किताब में,
और वीरान रातों में उसको सीने से लगा कर
तेरे रूबरू होने सा सुकूं आयेगा ।

और तू ! 

छुप छुप के रोयेगी   
जागेगी रात रात भर
दामन भिगोएगी,
मेरा चेहरा तेरी यादों से धुल भी जाये शायद...
तेरे दिल कि आतिश को बुझा सके
आंसूं इतने कहाँ से लाएगी ।  

-पुलस्त्य