चांदनी रात इस कदर तेरी यादो का जुनूं लाती है,
अरमानो कि तपिश से मेरी रूह भी झुलस जाती है
छोड़ सुलगता तन मेरी परछाई भी खाक़ में लोटती है,
जब सांसो कि गर्मी अंगार हो चिता जिस्म कि जलाती है,
जमीं पे बरसती शबनम से उठती तेरे तन कि खुश्बू,
अाब-ए-हयात है, करके रहम सहर पिला जाती है।
- पुलस्त्य
अरमानो कि तपिश से मेरी रूह भी झुलस जाती है
छोड़ सुलगता तन मेरी परछाई भी खाक़ में लोटती है,
जब सांसो कि गर्मी अंगार हो चिता जिस्म कि जलाती है,
जमीं पे बरसती शबनम से उठती तेरे तन कि खुश्बू,
अाब-ए-हयात है, करके रहम सहर पिला जाती है।
- पुलस्त्य