Monday, 18 November 2013

मील का पत्थर

मीत ने
ना देखा, ना दी कोई आवाज़ ही मुड़कर, 
हम
आज भी इंतज़ार मैं नज़रें गड़ाए बैठे हैं,
जैसे 
राह के हाशिये पर एक मील का पत्थर ।

-पुलस्त्य 

Sunday, 17 November 2013

ख़्वाब

हाल कुछ ऐसा है 
मेरे ख्वाबो कि तामीर का,
आँखों मैं उभर आता है तेरा चेहरा
रंग लिए मेरी तक़दीर का ।

धुआँ धुआँ ये रात है 
जैसे घुलना अब्र मै अबीर का,
मेरे दिल के आसमां पे गुलाबी चाँद 
है टुकड़ा तेरी तस्वीर का ।  

तय हुआ 
बंधना तुझसे मेरी तक़दीर का,
तेरे चहरे पे ये बल खाती ख़म लट
छल्ला है मेरी जंजीर का ।

-पुलस्त्य   

इंतज़ार

इतना तो असर 
ज़रूरी है
मेरे इंतज़ार में ....
एक फूल 
कम खिले
तेरी 
फ़सले बहार में.....

- पुलस्त्य    

Saturday, 16 November 2013

उम्र

अब याद नहीं 
दिन, महीने, साल...
दो हिस्सो मैं है तमाम उम्र मेरी,
एक...
तेरे आने से पहिले,
एक... 
तेरे जाने के बाद ।

-पुलस्त्य 

Tuesday, 12 November 2013

ज़ुल्म

अगर
तेरे जुल्म  कि
ये इंतिहा नहीं
तो और क्या है? 
के रोती आँखों को तेरी उम्मीद तक नहीं....
और पल भर आँख लगते ही, 
तुम आँखों मैं उतर आती हो !

-पुलस्त्य   

काँटे

काँटों से
तेरी राह के
नशेमन बुनता हूँ 
यादों के संग तेरी
घर एक बसाना है ।


-पुलस्त्य

Sunday, 10 November 2013

शराब

इंसाफ करता वक़्त
तेरे जुल्मो का ये सिला देता 
भर देता मेरे जख्म-ए-जिगर को 
एक भद्दा सा निशां देता । 

वो निशां दुनिया पर 
तेरी फितरत का यूँ बयान होता 
मैं बेचारा ......और
नाम तेरा बेवफा, बेरहम होता ।

पर ये इश्क़ है
इसकी अलग रवायत होती है
छोड़ अपना चाक़ जिगर
बाजुए क़ातिल कि फ़िक्र होती है ।

गोया, बर्बादी का 
खुद इल्जाम उठा लेता हूँ
तुझपे उंगली न उठे, इसलिए 
हर शाम जाम उठा लेता हूँ ।

बहुत बदनाम सही, मगर  
ये शराब 'सूफी'का काम करती है
बे पर्दा ना हो शरीफ क़ातिल, ताकि 
सब गुनाह इश्क के अपने नाम करती है ।

झुकाओ ि सर मय के सिजदे मैं
ऐ हुस्न वालो, के तुमपे ये अहसान करती है
भरके ज़ख़्म भद्दे निशां ना बन जायें ताकि
चुपके से जिगर को नोचने का काम करती है ।

-पुलस्त्य

Tuesday, 5 November 2013

रात के रंग मौसमो के संग


....................................( सर्द रात)
पल भर को चाँद निकला 
और खामोश रात का माथा चूम कर छिप भी गया 
फिर ना जाने कब तलक,
अरमानो की मारी सर्द रात सुलगती रही
जिस्म से सुबह देर तक ठंडा धुंआ उठता रहा ।

....................................( बरसात की रात)
झूम कर बरसते बादलों में 
थिरकती छरहरी बेबाक बिजलियों के साथ  
नाची सुबह तलक रात,
अलहड़ जिस्म से सौंधी खुशबु बिखरती रही
अंगड़ाई में मीठी सी टूटन का असर दिखता रहा ।

....................................(गर्मी की रात)
पत्ता पत्ता बूटा बूटा सहमा सा था 
आसमान में गुमसुम बादलों की कतारों से
शाम ही से रूठी थी रात,
तुनक कर बडबडाती हो ऐसे बयार चलती रही 
भोंर तक गालो पर गुस्से की लाली का असर दिखता रहा ।

- पुलस्त्य 
  

नीली पोशाक


नीली पोशाक में वो जब लहरा कर चलते हैं

तो यूँ लगता है जैसे:

काली घनेरी जुल्फो की बदली में लिपटा

बिजली के कुंडल चमकाता
आंखो के चांद सूरज सजा कर
आसमान का कोई टुकड़ा जमी पे उतर आया हो,

या


गहरे नीले पानी में लिपटी

चेहरे पर चांद की परछायी सजाये
वादी के सारे फूलों की
खुशबुखुद में सिमेटे
इतराती हुई कोई पहाड़ी नदी 
आज रात शहर घुमने चली आयी है ।

 - पुलस्त्य  


याद


दिल को तू याद आये एैसे, 
दिल से धड़कन बिछड़ जाये जैसे,
रो रो कर आसमाँ सर पे उठा रखा है,
इस दीवाने दिल को कोई समझाए कैसे?

तेरे ख्वाब आ आ रुलाते हैं,
रात भर एक टीस सी उठती रहती है,
पल भर को नींद नहीं आँखों में तो बता,
खुली आँखों को कोई जगाये कैसे?

चश्म- ऐ-नम, मुस्कुराता हूँ, 
लोग फिर भी हालत पे सवाल करते हैं,
कफ़न तो चटख डाल दिया लेकिन,
लाश को कोई  चलना  सिखाऐ कैसे? 

काश  तेरे गम में मर ही जाते,
लेकिन, जान भी तुझी में अटकी है,
अब तू ही रहा बता ऐ मसीहा मेरी,
जान आ मिले, या मेरी जान जाये कैसे?

-पुलस्त्य   


  

एक लड़की


एक  खोई  खोई सी लडकी 
दूर  शितिज  को देखते   हुई,
हौले से अपनी  सुनहरी  
नर्म जुल्फों  में जब उंगलिया फिराती  है,
बस  उसे  
देखते रहेने को दिल करता  है
जिंदगी ठहर सी जाती है।

गहरी झील सी ठहरी आँखों में
मीठी सी कोई शिकायत लिए 
करती है रब से यूँ ही बातें 
या बस अकेले में रह रह गुनगुनाती है,
रूकती है धड़कन
जब उसके होठो की नर्म पंखुडियां
हौले से कंपकपाती हैं ।

हथेली  पे टिकाये चाँद सा चेहरा 
तीरछी गर्दन की सुराही किये
गुलाबी शबनम से उसके गालो को 
चूमती बेबाक लटो को जब 
गुस्से से  वो हटाती है,
सरसराती हैं जोश में हरी पत्तियां 
जैसे हवा भी मुस्कुराती है ।

-पुलस्त्य

  

जुल्म

और क्या कहिये, खुदा पर भी इंसानी जुल्म के बयाँ देखे,
एक गिरजे मे हमने यशु के पांवो पर जलने के निशाँ देखे।  

-पुलस्त्य  

शिकायत

सीने में 
जब
तेरी यादों का 
एक गुब्बार सा उठता है
तो
नज़र बेहताशा 
आसमां की तरफ उठ जाती है,

और 
एक शिकायत 
लबों तक आ कर
इस ख्याल से रुक जाती है

की यूँ भी
मौला ने बहुत मेरे जीने 
का सामान किया, 
नहीं दिया 
तेरा साथ गर
तेरा गम तो खूब दिया,

अगर
तेरा गम ना होता, 
सीने में
ये दर्द कहाँ से होता,
मुर्दा सी 
कट जाती जिंदगी,
मरने  जीने में
फर्क कहाँ से होता ।

-पुलस्त्य  

दूरी

तुझसे ये दूरी अब मुझे इस नए अंदाज मे तडपाती है । 
के भुलाने लगा हूं तेरा चेहरा, तेरी याद बढ़ती जाती है ।।

गुम गया चेहरा गर, हर आह मे रहेगा तेरा अहसास ।
आतिश ये मेरे दिल मैं,  तेरी नर्म सांसो से हवा पाती है ।।

कभी देख, भूली नहीं है तू भी उन पलों की सरगोशियाँ ।
ओढे ख़ामोशी, नम्म आंखे लिए क्यूँ बेवजह मुस्कुराती है ।।

मैं पतंगा हूं, यूँ भी बस प़ल दो प़ल मे मिट जाऊंगा ।
शम-ए-खामोश, क्यूँ नहीं एकबार झूम के ज़ल जाती है ।।

-पुलस्त्य 
  

तस्वीरें

आदमी खो गए बस रह गयी तस्वीरे ।
वक़्त में घुल के फीकी पड़ती तस्वीरे ।
किसी दिल में कुछ यादों की तस्वीरे ।।
और चंद रोज, यादें रहेंगी न तस्वीरे ।।

-पुलस्त्य  

शबनम

छुपकर तकने चाँद को
ओढ़ अन्धेरा निकली,
सर्दी की वो रात,
झम झम बरसी चांदनी
ऐसी आग लगायी,
सुलगी, पिंघली भोर तक
बन शबनम ढल अायी।

-पुलस्त्य 

ज़िंदगी

हर सुबह एक नयी चाह....
कुछ हांसिल हुआ 
कुछ की हसरत रह गयी,
जो मिल गया वो धुँअा हुआ
जो रह गया जला गया
रात भर रुला गया,
जगे तो कुछ और याद न रहा
बस वही, 
एक और नयी सुबह, एक और नयी चाह ।

-पुलस्त्य 
  

तासीर

आजकल मन अक्सर  जब अकेला होता है 
तो दिल के एक जिन्दा बचे कोने मे सहेज कर रखे  
तेरी यादों के टुकड़े निकाल लेता है
और आँखों की चादर बिछाकर उस पर टुकड़ा टुकड़ा सजाता है,
पर अब पहले सी तेरी तस्वीर नहीं बनती
अक्स तो फिर भी तुझसे मिलता जुलता है
तासीर नहीं मिलती। 

-पुलस्त्य