मीत ने
ना देखा, ना दी कोई आवाज़ ही मुड़कर,
हम
आज भी इंतज़ार मैं नज़रें गड़ाए बैठे हैं,
जैसे
राह के हाशिये पर एक मील का पत्थर ।
-पुलस्त्य
ना देखा, ना दी कोई आवाज़ ही मुड़कर,
हम
आज भी इंतज़ार मैं नज़रें गड़ाए बैठे हैं,
जैसे
राह के हाशिये पर एक मील का पत्थर ।
-पुलस्त्य