....................................( सर्द रात)
पल भर को चाँद निकला
और खामोश रात का माथा चूम कर छिप भी गया
फिर ना जाने कब तलक,
अरमानो की मारी सर्द रात सुलगती रही
जिस्म से सुबह देर तक ठंडा धुंआ उठता रहा ।
....................................( बरसात की रात)
झूम कर बरसते बादलों में
थिरकती छरहरी बेबाक बिजलियों के साथ
नाची सुबह तलक रात,
अलहड़ जिस्म से सौंधी खुशबु बिखरती रही
अंगड़ाई में मीठी सी टूटन का असर दिखता रहा ।
....................................(गर्मी की रात)
पत्ता पत्ता बूटा बूटा सहमा सा था
आसमान में गुमसुम बादलों की कतारों से
शाम ही से रूठी थी रात,
तुनक कर बडबडाती हो ऐसे बयार चलती रही
भोंर तक गालो पर गुस्से की लाली का असर दिखता रहा ।
- पुलस्त्य
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