नीली पोशाक में वो जब लहरा कर चलते हैं
तो यूँ लगता है जैसे:
काली घनेरी जुल्फो की बदली में लिपटा
बिजली के कुंडल चमकाता
आंखो के चांद सूरज सजा कर
आसमान का कोई टुकड़ा जमी पे उतर आया हो,
या
गहरे नीले पानी में लिपटी
चेहरे पर चांद की परछायी सजाये
वादी के सारे फूलों की
खुशबुखुद में सिमेटे
इतराती हुई कोई पहाड़ी नदी
आज रात शहर घुमने चली आयी है ।
- पुलस्त्य
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