Tuesday, 5 November 2013

शिकायत

सीने में 
जब
तेरी यादों का 
एक गुब्बार सा उठता है
तो
नज़र बेहताशा 
आसमां की तरफ उठ जाती है,

और 
एक शिकायत 
लबों तक आ कर
इस ख्याल से रुक जाती है

की यूँ भी
मौला ने बहुत मेरे जीने 
का सामान किया, 
नहीं दिया 
तेरा साथ गर
तेरा गम तो खूब दिया,

अगर
तेरा गम ना होता, 
सीने में
ये दर्द कहाँ से होता,
मुर्दा सी 
कट जाती जिंदगी,
मरने  जीने में
फर्क कहाँ से होता ।

-पुलस्त्य  

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