सीने में
जब
तेरी यादों का
एक गुब्बार सा उठता है
तो
नज़र बेहताशा
आसमां की तरफ उठ जाती है,
और
एक शिकायत
लबों तक आ कर
इस ख्याल से रुक जाती है
की यूँ भी
मौला ने बहुत मेरे जीने
का सामान किया,
नहीं दिया
तेरा साथ गर
तेरा गम तो खूब दिया,
अगर
तेरा गम ना होता,
सीने में
ये दर्द कहाँ से होता,
मुर्दा सी
कट जाती जिंदगी,
मरने जीने में
फर्क कहाँ से होता ।
-पुलस्त्य
जब
तेरी यादों का
एक गुब्बार सा उठता है
तो
नज़र बेहताशा
आसमां की तरफ उठ जाती है,
और
एक शिकायत
लबों तक आ कर
इस ख्याल से रुक जाती है
की यूँ भी
मौला ने बहुत मेरे जीने
का सामान किया,
नहीं दिया
तेरा साथ गर
तेरा गम तो खूब दिया,
अगर
तेरा गम ना होता,
सीने में
ये दर्द कहाँ से होता,
मुर्दा सी
कट जाती जिंदगी,
मरने जीने में
फर्क कहाँ से होता ।
-पुलस्त्य
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