इंसाफ करता वक़्त
तेरे जुल्मो का ये सिला देता
भर देता मेरे जख्म-ए-जिगर को
एक भद्दा सा निशां देता ।
वो निशां दुनिया पर
तेरी फितरत का यूँ बयान होता
मैं बेचारा ......और
नाम तेरा बेवफा, बेरहम होता ।
पर ये इश्क़ है
इसकी अलग रवायत होती है
छोड़ अपना चाक़ जिगर
बाजुए क़ातिल कि फ़िक्र होती है ।
गोया, बर्बादी का
खुद इल्जाम उठा लेता हूँ
तुझपे उंगली न उठे, इसलिए
हर शाम जाम उठा लेता हूँ ।
बहुत बदनाम सही, मगर
ये शराब 'सूफी'का काम करती है
बे पर्दा ना हो शरीफ क़ातिल, ताकि
सब गुनाह इश्क के अपने नाम करती है ।
झुकाओ ि सर मय के सिजदे मैं
ऐ हुस्न वालो, के तुमपे ये अहसान करती है
भरके ज़ख़्म भद्दे निशां ना बन जायें ताकि
चुपके से जिगर को नोचने का काम करती है ।
-पुलस्त्य
तेरे जुल्मो का ये सिला देता
भर देता मेरे जख्म-ए-जिगर को
एक भद्दा सा निशां देता ।
वो निशां दुनिया पर
तेरी फितरत का यूँ बयान होता
मैं बेचारा ......और
नाम तेरा बेवफा, बेरहम होता ।
पर ये इश्क़ है
इसकी अलग रवायत होती है
छोड़ अपना चाक़ जिगर
बाजुए क़ातिल कि फ़िक्र होती है ।
गोया, बर्बादी का
खुद इल्जाम उठा लेता हूँ
तुझपे उंगली न उठे, इसलिए
हर शाम जाम उठा लेता हूँ ।
बहुत बदनाम सही, मगर
ये शराब 'सूफी'का काम करती है
बे पर्दा ना हो शरीफ क़ातिल, ताकि
सब गुनाह इश्क के अपने नाम करती है ।
झुकाओ ि सर मय के सिजदे मैं
ऐ हुस्न वालो, के तुमपे ये अहसान करती है
भरके ज़ख़्म भद्दे निशां ना बन जायें ताकि
चुपके से जिगर को नोचने का काम करती है ।
-पुलस्त्य
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