Sunday, 10 November 2013

शराब

इंसाफ करता वक़्त
तेरे जुल्मो का ये सिला देता 
भर देता मेरे जख्म-ए-जिगर को 
एक भद्दा सा निशां देता । 

वो निशां दुनिया पर 
तेरी फितरत का यूँ बयान होता 
मैं बेचारा ......और
नाम तेरा बेवफा, बेरहम होता ।

पर ये इश्क़ है
इसकी अलग रवायत होती है
छोड़ अपना चाक़ जिगर
बाजुए क़ातिल कि फ़िक्र होती है ।

गोया, बर्बादी का 
खुद इल्जाम उठा लेता हूँ
तुझपे उंगली न उठे, इसलिए 
हर शाम जाम उठा लेता हूँ ।

बहुत बदनाम सही, मगर  
ये शराब 'सूफी'का काम करती है
बे पर्दा ना हो शरीफ क़ातिल, ताकि 
सब गुनाह इश्क के अपने नाम करती है ।

झुकाओ ि सर मय के सिजदे मैं
ऐ हुस्न वालो, के तुमपे ये अहसान करती है
भरके ज़ख़्म भद्दे निशां ना बन जायें ताकि
चुपके से जिगर को नोचने का काम करती है ।

-पुलस्त्य

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