Sunday, 27 April 2014

शिक्षा

बातों में अब वो बात नज़र नहीं आती,
अब कहीं कोइ आग नज़र नहीं आती,
तालिमयाफ्ता लपटें हैं नए ज़माने की,
चमकती हैं पर, आंच नज़र नहीं आती ।

उगने लगे है जंगल भी अब कतारों मैं,
खिलते हैं बस फूल गुलाब ही बहारों मैं,
कीकर, बबुल और बेर नज़र नहीं आती,
बेपरवाह, अमर बेल नज़र नहीं  आती ।

अब कायदा सब सीख गए अदब का,
मतलब कोई नहीं पूछता किसी सबक का,
ग़ालिब को सोचने पे जो मजबूर कर दे,
बेअदबी की वो आवाज नज़र नहीं आती ।

-पुलस्त्य

Thursday, 24 April 2014

तेरा ग़म

मत पूछ क्यों मेरी आँखों मे नमी है,
तेरा गम सलामत मुझे क्या कमी है ।

ये दिल धड़कता रहेगा तेरी याद मे,
नब्ज का क्या फिर थमी है तो थमी है ।

-पुलस्त्य

आग

सुबहो जलती है, शाम जलती है,
दिल में कोई आग, दिन तमाम जलती है ।

काग़ज़ी ख्वाब हैं, मोम की हैं हसरतें,
इस बेबसी की आग में दोनो, कमाल जलती हैं ।

महबूब की देन है, है दोस्तों का प्यार,
के जिक्र-ए-वफ़ा में अब मेरी, जुबान जलती है ।

लुट गयी महफ़िल, मिट गए परवाने,
सहरी तक दो पल और बस, शमा बेजान जलती है ।

दिल एक अंगार है, लावा है रगों मे,
एक लाश चिता मे जैसे, पुरआराम जलती हैं ।

-पुलस्त्य

Saturday, 19 April 2014

रात

रह रह ग़म के झोंके चलते रहे, 
हर पल यादों के कांटे चुभते रहे, 
और मैं फूल सी मुस्कुराती रहीं,  
रात भर आपकी याद आती रही ।

फलक पे एक खेल सा चलता रहा,
बनके तेरा चेहरा चाँद छलता रहा,
नरम चांदनी भी तन जलाती रही,
रात भर आपकी याद आती रही ।  

हर आहट एक उम्मीद जगाती रही,
मेरी ही परछाई मुझको सताती रही ,
तेरे साये सी मुझसे लिपट जाती रही,
रात भर आपकी याद आती रही ।

दिल की आतिश मंद हो ना जाये कहीं,
एक भी आंसू आँख से गिरने ना दिया,
आंधी में सूखी पत्ती सी फड़फड़ाती रही,
रात भर आपकी याद आती रही ।

-पुलस्त्य

( A tribute to 'Faiz' and 'Makhdoom')

Monday, 14 April 2014

your touch

Tender touch of fingertips on my chest
Your breath is still burning my neck,
Sweating in my arms are you 
Like gold, washed in morning dew,
I am touching the contours of your body 
Hesitant and greedy, and yet
Two bodies flamed by one desire 
Purified, after burning in relentless fire.

Even with closed eyes I feel, next to me, your limitless expanse 
As if a lush valley wrapped in transparent sunlight 
descending on a barren stretch,
In its bosom lies the eternal calm, 
beside the rivers flowing down like your full arms,
Your hair, cool and fragrant like morning showers
Make a stone breathe with their revitalising powers.

- Pulastya 

Sunday, 13 April 2014

प्रेम स्पर्श


सीने पर तेरी उँगलियों की छुअन.....
तेरी सांसो की गर्मी से झुलसती गर्दन,
पसीने मे भीगी यूँ मेरी बाँहों मे समायी हो 
सोने की कोई मूरत जैसे औस मे नहाई हो ।
कांपते हाथों से ऐसे छूता हूँ आकार को तेरे,
जैसे दरिद्र के हाथों मे जहाँ की दौलत थमाई हो ।
एक ही अरमान मे जलते हुए दो तन कुछ देर मे पाक हो जायेंगे,
प्रेम की अग्नि मे जलाकर जैसे भभूती की राख बनायीं हो ।।

बंद आँखों की दरारों मे झांकता है मुझसे लिपटा तेरा विस्तार.....
सुबह की झिनी धूंप को पहने कोई वादी जैसे सहरा मे उतर आई हो,
जिसके उरोज़ो के साये मे आकर जहाँन भर का चैन बसता है
जिसके पैरों को तरंग देने को नदियां बहाई हो । 
तेरी जुल्फों की घटाओं के साये मैं कुछ देर जी लेगा ये मरू भी 
के तेरी खैरात से जैसे सहरा की किस्मत भी सवर आई हो ।।

-पुलस्त्य

Saturday, 12 April 2014

तू

कई रोज से इक खुशबु मुझे दीवाना बना रही है,
तेरे तन की डाँली गुलाब बनी है शायद ।

नरम सुबह सी मासूमियत है रोशनी मैं दिनभर,
सूरज पर, तेरे बदन के सोने की परत चढ़ी है शायद ।

इस कदर तो मदहोश करती नहीं थी ये हवाएँ,
अब इनमे तेरे होठों की नमी मिली है शायद ।

ये गुरूर चांदनी की फितरत मे नया-नया है,
बनके बिंदिया तेरे माथे सजी है शायद ।

बेरोक ये तेरे दीदार की दयानतदारी हम पर,
 तू नयी-नयी खुदा बनी है शायद ।

बहुत दिनों बाद है ये गर्मजोशी, ये जलसे का आलम,
फिर किसी आशिक की चिता सजी है शायद ।

-पुलस्त्य

Sunday, 6 April 2014

शराब


यूं तो पानी ठहरा !
तेरे हुस्न कि रंगत, मेरे जिगर का लहूँ
करते हैं रंग सुनहरा शराब का ।

कोई कैसे बतायें !
गुनाह है या ता-उम्र जलने का इनाम है?
ये प्याला शराब का ।

गम के मारो से 
हर शब मिलने आती है दो कतरे जिंदगी,
भेष बदल कर शराब का ।

लहू में दोनों हैं मगर!
मय उदास है और दर्द पर बहार है,
तेरे असर पे, बेअसर होना शराब का ।

खुदा भी सिमट गया कुरान में !
लेकिन, ख्याम-मीरओ-बच्चन से कितने आये 
हुआ नहीं मुक्कमल बयां शराब का ।

-पुलस्त्य