Thursday, 24 April 2014

आग

सुबहो जलती है, शाम जलती है,
दिल में कोई आग, दिन तमाम जलती है ।

काग़ज़ी ख्वाब हैं, मोम की हैं हसरतें,
इस बेबसी की आग में दोनो, कमाल जलती हैं ।

महबूब की देन है, है दोस्तों का प्यार,
के जिक्र-ए-वफ़ा में अब मेरी, जुबान जलती है ।

लुट गयी महफ़िल, मिट गए परवाने,
सहरी तक दो पल और बस, शमा बेजान जलती है ।

दिल एक अंगार है, लावा है रगों मे,
एक लाश चिता मे जैसे, पुरआराम जलती हैं ।

-पुलस्त्य

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