सीने पर तेरी उँगलियों की छुअन.....
तेरी सांसो की गर्मी से झुलसती गर्दन,
पसीने मे भीगी यूँ मेरी बाँहों मे समायी हो
सोने की कोई मूरत जैसे औस मे नहाई हो ।
कांपते हाथों से ऐसे छूता हूँ आकार को तेरे,
जैसे दरिद्र के हाथों मे जहाँ की दौलत थमाई हो ।
एक ही अरमान मे जलते हुए दो तन कुछ देर मे पाक हो जायेंगे,
प्रेम की अग्नि मे जलाकर जैसे भभूती की राख बनायीं हो ।।
बंद आँखों की दरारों मे झांकता है मुझसे लिपटा तेरा विस्तार.....
सुबह की झिनी धूंप को पहने कोई वादी जैसे सहरा मे उतर आई हो,
जिसके उरोज़ो के साये मे आकर जहाँन भर का चैन बसता है
जिसके पैरों को तरंग देने को नदियां बहाई हो ।
तेरी जुल्फों की घटाओं के साये मैं कुछ देर जी लेगा ये मरू भी
के तेरी खैरात से जैसे सहरा की किस्मत भी सवर आई हो ।।
-पुलस्त्य
No comments:
Post a Comment