Saturday, 12 April 2014

तू

कई रोज से इक खुशबु मुझे दीवाना बना रही है,
तेरे तन की डाँली गुलाब बनी है शायद ।

नरम सुबह सी मासूमियत है रोशनी मैं दिनभर,
सूरज पर, तेरे बदन के सोने की परत चढ़ी है शायद ।

इस कदर तो मदहोश करती नहीं थी ये हवाएँ,
अब इनमे तेरे होठों की नमी मिली है शायद ।

ये गुरूर चांदनी की फितरत मे नया-नया है,
बनके बिंदिया तेरे माथे सजी है शायद ।

बेरोक ये तेरे दीदार की दयानतदारी हम पर,
 तू नयी-नयी खुदा बनी है शायद ।

बहुत दिनों बाद है ये गर्मजोशी, ये जलसे का आलम,
फिर किसी आशिक की चिता सजी है शायद ।

-पुलस्त्य

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