कई रोज से इक खुशबु मुझे दीवाना बना रही है,
तेरे तन की डाँली गुलाब बनी है शायद ।
नरम सुबह सी मासूमियत है रोशनी मैं दिनभर,
सूरज पर, तेरे बदन के सोने की परत चढ़ी है शायद ।
इस कदर तो मदहोश करती नहीं थी ये हवाएँ,
अब इनमे तेरे होठों की नमी मिली है शायद ।
ये गुरूर चांदनी की फितरत मे नया-नया है,
बनके बिंदिया तेरे माथे सजी है शायद ।
बेरोक ये तेरे दीदार की दयानतदारी हम पर,
तू नयी-नयी खुदा बनी है शायद ।
बहुत दिनों बाद है ये गर्मजोशी, ये जलसे का आलम,
फिर किसी आशिक की चिता सजी है शायद ।
-पुलस्त्य
तेरे तन की डाँली गुलाब बनी है शायद ।
नरम सुबह सी मासूमियत है रोशनी मैं दिनभर,
सूरज पर, तेरे बदन के सोने की परत चढ़ी है शायद ।
इस कदर तो मदहोश करती नहीं थी ये हवाएँ,
अब इनमे तेरे होठों की नमी मिली है शायद ।
ये गुरूर चांदनी की फितरत मे नया-नया है,
बनके बिंदिया तेरे माथे सजी है शायद ।
बेरोक ये तेरे दीदार की दयानतदारी हम पर,
तू नयी-नयी खुदा बनी है शायद ।
बहुत दिनों बाद है ये गर्मजोशी, ये जलसे का आलम,
फिर किसी आशिक की चिता सजी है शायद ।
-पुलस्त्य
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