Sunday, 23 February 2014

अहसास

हम नहीं पीते 
ये लर्ज़िश दी हुई तुम्हारी है,
जब तू बांहों में थी
ये उन पलों कि खु़मारी है,
अब और रहने दे
इस हाँ-हाँ नहीं-नहीं को,
तेरा तो खेल हुआ
आफत में जान हमारी है,
मर जायेंगे तेरी ना से 
और दुनिया से कह जायेंगे,
मेरे क़ातिल पे रहम, मगर 
जानम हमको जान से प्यारी है ।

मैं जानता हूँ कि 
वो नहीं उठकर चलने वाले,
अपने आशियाँ के 
सुकुं से नहीं निकलने वाले,
मेरी दीवानगी से 
उनका तो बस इतना नाता होगा
कि, आईने के सामने
इतराने का सबब मिल जाता होगा,
मेरी आह सुनते है तो
अपने हुस्न पे रह रह गुरुर आता होगा,
मेरी तड़प से मेरा क़ातिल
अपनी ताक़त का अंदाजा लगाता होगा ।
  
'अहसास, है
नाम तेरा, लबों पे ना लायेंगे
बस दिल ही दिल में
दुआओं में बार-बार दोहराएंगे,
करेंगें जुर्म जो तुम कहो
फिर जो सजा भी दोगी, निभाएंगे,
इनायत कि ना सही 
पर अपनी नज़र ना हटाना हमसे 
फिर क्या के हम पर
गर्दिशों के दौर यूँ ही चलते जायेंगे,
परवाह नहीं के वो
याद भी रखेंगे हमें कि भूलेगे
इतना कहेंगे उनसे
जब हम नहीं होंगे तो बहुत याद आयेंगे ।  

-पुलस्त्य

लर्ज़िश-लड़खडाहट

रात

रात जब आती है 
अजीब सा सुकून लाती है..

सूरज कि रोशनी 
हम निरहो से 
हमारी ओट छीन लेती है
होले से आ कर 
दिन भर के थके हारों को

अंधेरे कि चादर में छिपाती है

रात जब आती है 
अजीब सा सुकून लाती है.. 

दिन भर लड़ते लड़ते 
जीने कि दुश्वारिओं से 
इतने शौक से पाले हुए ग़म 
कहीं खो से जाते हैं 

फिर उनसे मिलाती है

रात जब आती है 
अजीब सा सुकून लाती है..

गहरा सन्नाटा इतना कि 
खुद का अहसास नहीं होता
गम सीने से लगा रहता है 
और दर्द नहीं होता
जिस्म पिंघल जाता है
बस एक सोच तैरती रहती है  

रात जब आती है 
अजीब सा सुकून लाती है..  

दो पल आँख लगे तो 
ख्वाब मैं भी तू बिछड़ने लगे तो
बस एक बुरा सपना है
ये सोच कर तेरे होने का 
यकीं बना रहता है,
दिल की चोट पर झूंठ भी
मरहम के काम आती है

रात जब आती है 
अजीब सा सुकून लाती है..  
  
-पुलस्त्य

Saturday, 15 February 2014

इश्क़

कुछ ऐसी मेरी तक़दीर है,
तेरे पैर कि बेड़ी
मेरे हाथ कि लकीर है

हशर देख मेरा तू कभी,
लहू सब आँख से टपक गया 
अब रग़ों मे बहती पीर है

दिल को मत आजमा तू,
आया तो आशिक़ 
रूठा तो फ़क़ीर है

तेरे लिए गुनाह सही,
तुझसे मुहोब्बत मगर 
मेरी रूह है मेरा जमीर है  

-पुलस्त्य

Sunday, 2 February 2014

दो नैना

जबसे तेरे नैना दो पैमाने हो गए
दिन रात झूमते हैं पीने वाले, 
और वीरान 
शहर के सारे मैख़ाने हो गए ।

ये जोश, ये जज्बा, ये आलमे जुनून,
शराब में नहीं, जो बात तुझमे है 
के बेखुदी छोड़ 
मयकश सारे, परवाने हो गए ।

अब न मयकदे कि वो बेरोशनी राह
ना साकी का तल्ख़ इन्तज़ार,
शराब बन चांदनी बरसी, 
अंदाज चाँद के साकियाने हो गए ।  

दिल ही में खिचती है दो घूँट
बैठते हैं जब तेरा चेहरा आँखों में उतार कर,
जबसे तुझे खुदा बनाया
जलवे शराब के रूहानी हो गए ।

यूँ ही पिलाती रहना इन आँखों से
वरना ता-उम्र की तौबा,
पी जबसे कोहेनूरी प्यालो में
कच्ची मिट्टी के बाक़ी पैमाने हो गए ।

-पुलस्त्य

  

Saturday, 1 February 2014

असर

होठो से तुम होठ लगा दो
इस बुझती रात को 
फिर सुलगा दो,
छू भर लो बस हाथ बढ़ा के   
नरम चाँद को 
आफताब बना दो ।

-पुलस्त्य