Sunday, 2 February 2014

दो नैना

जबसे तेरे नैना दो पैमाने हो गए
दिन रात झूमते हैं पीने वाले, 
और वीरान 
शहर के सारे मैख़ाने हो गए ।

ये जोश, ये जज्बा, ये आलमे जुनून,
शराब में नहीं, जो बात तुझमे है 
के बेखुदी छोड़ 
मयकश सारे, परवाने हो गए ।

अब न मयकदे कि वो बेरोशनी राह
ना साकी का तल्ख़ इन्तज़ार,
शराब बन चांदनी बरसी, 
अंदाज चाँद के साकियाने हो गए ।  

दिल ही में खिचती है दो घूँट
बैठते हैं जब तेरा चेहरा आँखों में उतार कर,
जबसे तुझे खुदा बनाया
जलवे शराब के रूहानी हो गए ।

यूँ ही पिलाती रहना इन आँखों से
वरना ता-उम्र की तौबा,
पी जबसे कोहेनूरी प्यालो में
कच्ची मिट्टी के बाक़ी पैमाने हो गए ।

-पुलस्त्य

  

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