Sunday, 23 February 2014

रात

रात जब आती है 
अजीब सा सुकून लाती है..

सूरज कि रोशनी 
हम निरहो से 
हमारी ओट छीन लेती है
होले से आ कर 
दिन भर के थके हारों को

अंधेरे कि चादर में छिपाती है

रात जब आती है 
अजीब सा सुकून लाती है.. 

दिन भर लड़ते लड़ते 
जीने कि दुश्वारिओं से 
इतने शौक से पाले हुए ग़म 
कहीं खो से जाते हैं 

फिर उनसे मिलाती है

रात जब आती है 
अजीब सा सुकून लाती है..

गहरा सन्नाटा इतना कि 
खुद का अहसास नहीं होता
गम सीने से लगा रहता है 
और दर्द नहीं होता
जिस्म पिंघल जाता है
बस एक सोच तैरती रहती है  

रात जब आती है 
अजीब सा सुकून लाती है..  

दो पल आँख लगे तो 
ख्वाब मैं भी तू बिछड़ने लगे तो
बस एक बुरा सपना है
ये सोच कर तेरे होने का 
यकीं बना रहता है,
दिल की चोट पर झूंठ भी
मरहम के काम आती है

रात जब आती है 
अजीब सा सुकून लाती है..  
  
-पुलस्त्य

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