Sunday, 19 January 2014

कोई

नज़र कि रेशमी डोर से 
दूर से,एक महीन छोर से 
बांध कर रखती हो मुझे,
कभी नजदीक आती नहीं...

दबी -दबी एक मुस्कान से 
उम्मीद बो कर मेरे दिल में 
झुकी-झुकी सोज़ नज़रों कि
कनखियों से इसे सींचती हो,
पर कभी कुछ कहती नही...

क्या करोगी जब 
दी हुई उम्मीद पर बहार आयेगी 
तेरे रंग में रंगे फूल खिलेंगे मेरी आँखों मे, 
मुझमे से 
तेरी महकती खुश्बू आयेगी ।

क्या करोगी जब 
जमी ख्वाइशे पिघल के बरसेगीं
और तेरे नूर कि बूंदे
मेरे चहरे की रौनक़ मे उभर आएंगी ।

लाख जतन करो तुम 
छुपी न रह सकोगी,
मेरे चहरे कि खिली रंगत से ही 
दुनिया तो समझ जायेगी ।

-पुलस्त्य

   

Sunday, 12 January 2014

रात

दिन ढले  ही से चलती 
बेचैन तेज हवाओं ने 
रात कि काली जुल्फों
को बिखेर दिया है........
रात के बालों में सजी 
सितारों कि लड़ियां
बिखरी हुई लटों में
कहीं खो गयी हैं
और मखमली दूब में छिपे हुए
जुगनुओं सी
रोशनी का हल्का हल्का सुराग 
छोड़ रही हैं..........
कुछ सांवले बादल 
रात के माथे के टीके चाँद को
बार बार आकर अपने पीछे छिपा लेते हैं, 
और फिर थोड़ी देर के लिये 
बिलकुल चुपचाप खड़े हो जाते हैं।
उनसे छनती रौशनी 
शैतान बच्चो के चेहरे कि दबी दबी सी
हसी जैसी लगती है.......

-पुलस्त्य
  

Friday, 10 January 2014

मैं

कई बार कोशिश की । 
अपना परिचय खुद से कराने की ,
कौन हूँ मै! ये समझ पाने की ।

औरों के मनदर्पण मैं खुद को देखा ,
तो पाया की मन का आइना अक्स नहीं दिखाता ,
तर्जुमा करता है । 

रंग, रूप, जात, धर्म में रंगा तर्जुमा,
आशा, उम्मीद, प्यार,नफरत में बंधा तर्जुमा ।

शख्शियत एक, गोया हर आदमी का अपना अलग तर्जुमा । 
मै, शायद, इन्ही तर्जुमो की गुथी हुई ऐसे माला हूँ जिसमे हर मिलने वाला एक और बीज पिरो जाता है । 

माला कभी पूरी नहीं होती । 
और मेरी खुदी, माला की डोर जैसी, 
कहीं छिप के रह जाती है, 
जिसका अहसास तो होता है पर दिखाई नहीं देती ।

-पुलस्त्य

अक्स- Image
तर्जुमा- Translation 
शख्शियत- Personality 
खुदी- Self 

Wednesday, 8 January 2014

तुम

बताओ तो कैसी हो तुम ?

कि कुछ ढ़ल गयी हो,
या वो ही
पूनम के पूरे 
चाँद जैसी हो तुम।

याद दिल से जाती नहीं!

ख्याल मैहकते हैं मेरे,
हर शाम 
दिल में बयार बनके 
बहती हो तुम।

तुम चाहे कुछ न बोलो  ! 

मैं तो सुनता हूँ कनबतियाँ
रोज़ तुम्हारी, 
पत्तियों की सरसराहट में
रहती हो तुम।

उफ़ ये तेरे होने का अहसास!

तकता रहता हूँ
कांधे को मेरे,
क़े जैसे 
सर रखके सोती हो तुम।

भूलती नहीं वो नजदीकियां!  

बेख्याल चूमता रहता हूँ 
हथेली अपनी,
यूंं लगता है
हाथ कि रेखा हो तुम। 

कभी उदास ना होना प्रिये!

दिल डूबता है
इस ख़्याल से,
कि मेरे आंसुओ में
छिपके रोती हो तुम। 

-पुलस्त्य


बयार- Pleasant fragrant wind 
कनबतियाँ- something said in the ear

Tuesday, 7 January 2014

खुदा

हमको खुदा बना दिया,
छीनके हमसे कू-ए-यार
एक आयत 
में बसा दिया।

डर से खुलने के राजे दिल,
दिल से निकाल कर
मंदिर 
में सजा दिया।

लगे ना ख्वाइशों कि तोहमत
इसलिए तूने,
नूर-ए-ईश्क को
नूर-ए-ईलाही बता दिया।

दिखाये ख्वाब संगमर्मरी,
फिर धड़कते दिल को
हज्र-ए-अस्वद
बना दिया।

जहाँ से सुनाई ना दें
मेरी आहें भी
मुझको इस कदर
ऊँचा उठा दिया।

छुपाने को अपनी तंगदिली 
मेरे मेहबूब ने
स्वांग 
खुदा का रचा दिया। 

-पुलस्त्य

कू-ए-यार - महबूब की गली
आयत      -इस्लाम के धार्मिक ग्रन्थ क़ुरान की सबसे छोटी ईकाई (verses)
हज्र-ए-अस्वद-The Black Stone in the eastern corner of the   Kaaba, symbolising something which is respected but not loved.
नूर-ए-ईश्क- glow of love
नूर-ए-ईलाही- glow of god 





Saturday, 4 January 2014

दर्द

इस दर्द को पहचानता हूँ ़़़़़़मैं ...
किस नस से उठेगा
किस रग में बसेगा
जानता हूँ मैं।

इन आँखों ने शरारत की...
इस दिल की हरारत को
अब इन्हीं के पानी से
उतारता हूँ मैं।

होती नहीं इस मर्ज कि दवा...
पल भर सुकुं पाने को 
रह रह बस नाम तेरा 
पुकारता हूँ मैं।

इतना दर्द सीने में समाऐ कैसे...
हौसला बढ़ाने को
दर्द है तो खुदा भी है
मानता हूँ मैं।

-पुलस्त्य 

हरारत- Fever 
नस   - Nerve
रग    - Vein

मैं /आप

तुमने छुआ 'मै' जलके राख हो गया 
ना दर्द, ना दाग और पाक हो गया,
दिया तूने क्या नशा इस बेखुदी में
'मै' कुछ बचा नहीं सब 'आप' हो गया ।

-पुलस्त्य