नज़र कि रेशमी डोर से
दूर से,एक महीन छोर से
बांध कर रखती हो मुझे,
कभी नजदीक आती नहीं...
दबी -दबी एक मुस्कान से
उम्मीद बो कर मेरे दिल में
झुकी-झुकी सोज़ नज़रों कि
कनखियों से इसे सींचती हो,
पर कभी कुछ कहती नही...
क्या करोगी जब
दी हुई उम्मीद पर बहार आयेगी
तेरे रंग में रंगे फूल खिलेंगे मेरी आँखों मे,
मुझमे से
तेरी महकती खुश्बू आयेगी ।
क्या करोगी जब
जमी ख्वाइशे पिघल के बरसेगीं
और तेरे नूर कि बूंदे
मेरे चहरे की रौनक़ मे उभर आएंगी ।
लाख जतन करो तुम
छुपी न रह सकोगी,
मेरे चहरे कि खिली रंगत से ही
दुनिया तो समझ जायेगी ।
-पुलस्त्य
दूर से,एक महीन छोर से
बांध कर रखती हो मुझे,
कभी नजदीक आती नहीं...
दबी -दबी एक मुस्कान से
उम्मीद बो कर मेरे दिल में
झुकी-झुकी सोज़ नज़रों कि
कनखियों से इसे सींचती हो,
पर कभी कुछ कहती नही...
क्या करोगी जब
दी हुई उम्मीद पर बहार आयेगी
तेरे रंग में रंगे फूल खिलेंगे मेरी आँखों मे,
मुझमे से
तेरी महकती खुश्बू आयेगी ।
क्या करोगी जब
जमी ख्वाइशे पिघल के बरसेगीं
और तेरे नूर कि बूंदे
मेरे चहरे की रौनक़ मे उभर आएंगी ।
लाख जतन करो तुम
छुपी न रह सकोगी,
मेरे चहरे कि खिली रंगत से ही
दुनिया तो समझ जायेगी ।
-पुलस्त्य
No comments:
Post a Comment