Friday, 10 January 2014

मैं

कई बार कोशिश की । 
अपना परिचय खुद से कराने की ,
कौन हूँ मै! ये समझ पाने की ।

औरों के मनदर्पण मैं खुद को देखा ,
तो पाया की मन का आइना अक्स नहीं दिखाता ,
तर्जुमा करता है । 

रंग, रूप, जात, धर्म में रंगा तर्जुमा,
आशा, उम्मीद, प्यार,नफरत में बंधा तर्जुमा ।

शख्शियत एक, गोया हर आदमी का अपना अलग तर्जुमा । 
मै, शायद, इन्ही तर्जुमो की गुथी हुई ऐसे माला हूँ जिसमे हर मिलने वाला एक और बीज पिरो जाता है । 

माला कभी पूरी नहीं होती । 
और मेरी खुदी, माला की डोर जैसी, 
कहीं छिप के रह जाती है, 
जिसका अहसास तो होता है पर दिखाई नहीं देती ।

-पुलस्त्य

अक्स- Image
तर्जुमा- Translation 
शख्शियत- Personality 
खुदी- Self 

1 comment:

  1. बहुत शानदार , आपकी लेखनी को सादर नमन

    ReplyDelete