Sunday, 18 May 2014

याद

तुझसे दूरी मुझे अब एक नए अंदाज में तड़पाती है,
भूलने लगा हूँ तेरा चेहरा, पर तू बहुत याद आती है ।
बोल याद नहीं, बस एक तेरा लहजा है ख्याल में, 
सूखी दरिया जमीं पे जैसे एक लकीर छोड जाती है ।

-पुलस्त्य

Saturday, 10 May 2014

ख़्वाब

तुम क्यूँ ख्वाब में आती हों.....
सँवारता हूँ जिन जख़्मो को 
अपने आंसूंओं के पानी से,
उनको फिर नोच जाती हों ।
तुम क्यूँ ख्वाब में आती हों.....
तेरा ईश्क़ जिंदगी था मेरी
तू नहीं तो मौत की उम्मीद है,
ख़्वाबों में यूँ आ - आ कर
अपने होने का अहसास दिला
उस उम्मीद को तोड़ जाती हों ।
तुम क्यूँ ख्वाब में आती हों.....

-पुलस्त्य

Sunday, 4 May 2014

अहसान

खुदा ने जब तुझको बनाया होगा
अपना बेहतरीन हिस्सा तुझमे लगाया होगा,
तेरी आँखों में है उसी की नर्मी
तेरा ये हुस्न उसके ही रूप का साया होगा ।

सूरज के सोने से तेरा तन गढ़ा होगा 
कुछ रंग गुलाबों का भी उसमे मिलाया होगा,
लचकती इस शाख-ए-बदन को तेरी
महकती पुरवाइयों में होले-होले तपाया होगा ।

घटाओं को बना के तेरे सर का ताज
तेरी मखमल सी नरम जुल्फों में सजाया होगा,
रख तारो जड़ा फलक तेरे माथे पे 
पूनम के चाँद को माथे की बिंदिया बनाया होगा ।

एक टक तुझे देख कर
टुकड़ा अपने दिल का तेरी मूरत में बिठाया होगा,
उठ बैठी होगे लेकर अंगड़ाई तू 
तो खुदा को मतलब इश्क़ का समझ आया होगा,
होगा अहसान खुदा पर किसी जमीं वाले का
उसकी खातिर तराश तुझे जमीं पे भिजवाया होगा।  

-पुलस्त्य