Saturday, 10 May 2014

ख़्वाब

तुम क्यूँ ख्वाब में आती हों.....
सँवारता हूँ जिन जख़्मो को 
अपने आंसूंओं के पानी से,
उनको फिर नोच जाती हों ।
तुम क्यूँ ख्वाब में आती हों.....
तेरा ईश्क़ जिंदगी था मेरी
तू नहीं तो मौत की उम्मीद है,
ख़्वाबों में यूँ आ - आ कर
अपने होने का अहसास दिला
उस उम्मीद को तोड़ जाती हों ।
तुम क्यूँ ख्वाब में आती हों.....

-पुलस्त्य

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