Sunday, 23 February 2014

अहसास

हम नहीं पीते 
ये लर्ज़िश दी हुई तुम्हारी है,
जब तू बांहों में थी
ये उन पलों कि खु़मारी है,
अब और रहने दे
इस हाँ-हाँ नहीं-नहीं को,
तेरा तो खेल हुआ
आफत में जान हमारी है,
मर जायेंगे तेरी ना से 
और दुनिया से कह जायेंगे,
मेरे क़ातिल पे रहम, मगर 
जानम हमको जान से प्यारी है ।

मैं जानता हूँ कि 
वो नहीं उठकर चलने वाले,
अपने आशियाँ के 
सुकुं से नहीं निकलने वाले,
मेरी दीवानगी से 
उनका तो बस इतना नाता होगा
कि, आईने के सामने
इतराने का सबब मिल जाता होगा,
मेरी आह सुनते है तो
अपने हुस्न पे रह रह गुरुर आता होगा,
मेरी तड़प से मेरा क़ातिल
अपनी ताक़त का अंदाजा लगाता होगा ।
  
'अहसास, है
नाम तेरा, लबों पे ना लायेंगे
बस दिल ही दिल में
दुआओं में बार-बार दोहराएंगे,
करेंगें जुर्म जो तुम कहो
फिर जो सजा भी दोगी, निभाएंगे,
इनायत कि ना सही 
पर अपनी नज़र ना हटाना हमसे 
फिर क्या के हम पर
गर्दिशों के दौर यूँ ही चलते जायेंगे,
परवाह नहीं के वो
याद भी रखेंगे हमें कि भूलेगे
इतना कहेंगे उनसे
जब हम नहीं होंगे तो बहुत याद आयेंगे ।  

-पुलस्त्य

लर्ज़िश-लड़खडाहट

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