Sunday, 9 March 2014

इश्क़

मैं शायर हूँ मेरा क्या है !

मेरी आँख का आंसू धड़कन से रवानी लेकर 
एक नज़्म बनेगा और कागज पर उभर आयेगा,
चूम लूंगा आँखों से उसकी नज़ाकत को 
और कभी ये मन उसके अल्फांजों से लिपट जायेगा,
चंद शेर पढूंगा और 
आँखों में तेरा चेहरा उभर आयेगा ।
तेरी यादों से तुझे तराश कर 
बसा लूँगा एक नज़्मो कि किताब में,
और वीरान रातों में उसको सीने से लगा कर
तेरे रूबरू होने सा सुकूं आयेगा ।

और तू ! 

छुप छुप के रोयेगी   
जागेगी रात रात भर
दामन भिगोएगी,
मेरा चेहरा तेरी यादों से धुल भी जाये शायद...
तेरे दिल कि आतिश को बुझा सके
आंसूं इतने कहाँ से लाएगी ।  

-पुलस्त्य

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