Thursday, 20 March 2014

जिस्म

तेरे गुदाज़ बदन कि सौंधी खुश्बू वो जुनूँ लाती है,
मिट्टी के तेरे जिस्म में मुझे खुदाई नज़र आती है ।

बेवज़ह ही नहीं चूमता फिरता कोई पत्थरों को !
रूह-ए-ईश्क़ तेरे जिस्म के काबे में बसर पाती है ?

दुनिया कहे दीवाना परवाह नहीं है मुझको ...,
तू क्यूँ मुझ पर इल्जाम बुतपरस्ती का लगाती है?

कुछ और नहीं ये, मेरी इबादत कि इंतहा के सिवाय 
जो हर पल मुझे तुझसे लिपट जाने को उकसाती है ।   

-पुलस्त्य

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