बातों में अब वो बात नज़र नहीं आती,
अब कहीं कोइ आग नज़र नहीं आती,
तालिमयाफ्ता लपटें हैं नए ज़माने की,
चमकती हैं पर, आंच नज़र नहीं आती ।
उगने लगे है जंगल भी अब कतारों मैं,
खिलते हैं बस फूल गुलाब ही बहारों मैं,
कीकर, बबुल और बेर नज़र नहीं आती,
बेपरवाह, अमर बेल नज़र नहीं आती ।
अब कायदा सब सीख गए अदब का,
मतलब कोई नहीं पूछता किसी सबक का,
ग़ालिब को सोचने पे जो मजबूर कर दे,
बेअदबी की वो आवाज नज़र नहीं आती ।
-पुलस्त्य
अब कहीं कोइ आग नज़र नहीं आती,
तालिमयाफ्ता लपटें हैं नए ज़माने की,
चमकती हैं पर, आंच नज़र नहीं आती ।
उगने लगे है जंगल भी अब कतारों मैं,
खिलते हैं बस फूल गुलाब ही बहारों मैं,
कीकर, बबुल और बेर नज़र नहीं आती,
बेपरवाह, अमर बेल नज़र नहीं आती ।
अब कायदा सब सीख गए अदब का,
मतलब कोई नहीं पूछता किसी सबक का,
ग़ालिब को सोचने पे जो मजबूर कर दे,
बेअदबी की वो आवाज नज़र नहीं आती ।
-पुलस्त्य
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