यूं तो पानी ठहरा !
तेरे हुस्न कि रंगत, मेरे जिगर का लहूँ
करते हैं रंग सुनहरा शराब का ।
कोई कैसे बतायें !
गुनाह है या ता-उम्र जलने का इनाम है?
ये प्याला शराब का ।
गम के मारो से
हर शब मिलने आती है दो कतरे जिंदगी,
भेष बदल कर शराब का ।
लहू में दोनों हैं मगर!
मय उदास है और दर्द पर बहार है,
तेरे असर पे, बेअसर होना शराब का ।
खुदा भी सिमट गया कुरान में !
लेकिन, ख्याम-मीरओ-बच्चन से कितने आये
हुआ नहीं मुक्कमल बयां शराब का ।
-पुलस्त्य
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