Sunday, 6 April 2014

शराब


यूं तो पानी ठहरा !
तेरे हुस्न कि रंगत, मेरे जिगर का लहूँ
करते हैं रंग सुनहरा शराब का ।

कोई कैसे बतायें !
गुनाह है या ता-उम्र जलने का इनाम है?
ये प्याला शराब का ।

गम के मारो से 
हर शब मिलने आती है दो कतरे जिंदगी,
भेष बदल कर शराब का ।

लहू में दोनों हैं मगर!
मय उदास है और दर्द पर बहार है,
तेरे असर पे, बेअसर होना शराब का ।

खुदा भी सिमट गया कुरान में !
लेकिन, ख्याम-मीरओ-बच्चन से कितने आये 
हुआ नहीं मुक्कमल बयां शराब का ।

-पुलस्त्य


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