Saturday, 19 April 2014

रात

रह रह ग़म के झोंके चलते रहे, 
हर पल यादों के कांटे चुभते रहे, 
और मैं फूल सी मुस्कुराती रहीं,  
रात भर आपकी याद आती रही ।

फलक पे एक खेल सा चलता रहा,
बनके तेरा चेहरा चाँद छलता रहा,
नरम चांदनी भी तन जलाती रही,
रात भर आपकी याद आती रही ।  

हर आहट एक उम्मीद जगाती रही,
मेरी ही परछाई मुझको सताती रही ,
तेरे साये सी मुझसे लिपट जाती रही,
रात भर आपकी याद आती रही ।

दिल की आतिश मंद हो ना जाये कहीं,
एक भी आंसू आँख से गिरने ना दिया,
आंधी में सूखी पत्ती सी फड़फड़ाती रही,
रात भर आपकी याद आती रही ।

-पुलस्त्य

( A tribute to 'Faiz' and 'Makhdoom')

No comments:

Post a Comment