Sunday, 29 December 2013

चांदनी रात

चांदनी रात इस कदर तेरी यादो का जुनूं लाती है,
अरमानो कि तपिश से मेरी रूह भी झुलस जाती है 

छोड़ सुलगता तन मेरी परछाई भी खाक़ में लोटती है,
जब सांसो कि गर्मी अंगार हो चिता जिस्म कि जलाती है,

जमीं पे बरसती शबनम से उठती तेरे तन कि खुश्बू,
अाब-ए-हयात  है, करके रहम सहर पिला जाती है।

- पुलस्त्य

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