हाय होंठों पे सुलगती रहे प्यास, पीने में वरना मज़ा क्या होगा,
हांसिल तो ये के मौत हमसफ़र है, जीने में वरना मज़ा क्या होगा,
बस हर ऐक घड़ी साँस लेना ही नहीं होता किसीका ज़िन्दा होना,
शबो-रोज़ घुटते रहें यूँ ही अरमाँ, सीने में वरना मज़ा क्या होगा।
--पुलस्त्य
हांसिल तो ये के मौत हमसफ़र है, जीने में वरना मज़ा क्या होगा,
बस हर ऐक घड़ी साँस लेना ही नहीं होता किसीका ज़िन्दा होना,
शबो-रोज़ घुटते रहें यूँ ही अरमाँ, सीने में वरना मज़ा क्या होगा।
--पुलस्त्य
No comments:
Post a Comment