Friday, 27 January 2017

शहर

तंग गलियों में उफनता सरों का सैलाब
शहर की रगों में लहू बनके दौड़ता था कभी........
अब जमने लगा है ।

कैन्सर जैसी भीड़ मौत बन पनप रही है
थके हुऐ शहर की रवानगी को निगल रही है........
अब ये शहर मरने लगा है ।

-पुलस्त्य

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