तंग गलियों में उफनता सरों का सैलाब
शहर की रगों में लहू बनके दौड़ता था कभी........
अब जमने लगा है ।
कैन्सर जैसी भीड़ मौत बन पनप रही है
थके हुऐ शहर की रवानगी को निगल रही है........
अब ये शहर मरने लगा है ।
-पुलस्त्य
शहर की रगों में लहू बनके दौड़ता था कभी........
अब जमने लगा है ।
कैन्सर जैसी भीड़ मौत बन पनप रही है
थके हुऐ शहर की रवानगी को निगल रही है........
अब ये शहर मरने लगा है ।
-पुलस्त्य
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