दीवाली की रात, एक दिया
पगडण्डी के अँधेरे छोर पे
देर तक जलता रहा........
उन्माद में बेसुध हवाओं के
थपेड़े रह रह पड़ते रहे, और
दिया तम से लड़ता रहा....
वजूद की गर्मी मे जिस्म जला
नाजुक सी लौ बार - बार
गिरती रही संभलती रही.....
सहमी सी सर झुका के कभी
और कभी पलट हवाओं को
ललकार के, जलती रही......
भौर में जब सांस थमने लगी
तो भी तम के सीने पे वज्रा चला गया....
बुझता हुआ दिया चैन से हंस कर
अपने अंश से सूरज को सुलगा गया....
-पुलस्त्य
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