छज्जा उदास है कल से। पड़ती धूप का रंग बता रहा है। गुनगुना सुनहरी रंग जलता हुआ संतरी हो गया है। गरमी में जैसे स्याह पड़ गया हो। मंद हवा जिस रोशनदान से बहकर बांसुरी की लय पकड़ लेती थी अब जैसे चोट खा कर कहराह रही है। बदलते मौसम का असर है शायद ।
पर, मौसम तो हर बार बदलता है ये उदासी पहले नहीं देखी। ये उदासी साथी के खोने की लगती है। कई दिन से बेसुरा पंछी नहीं आया है। गीत जो रोज गाता था, नहीं गाया है। न जाने कितने बरसों से नन्हा हर रोज दाना चुगने आता है, गीत गाता, कुछ वक़्त िबताता, उड़ जाता है। कर्कश अावाज में न जाने क्या गाता, पर छज्जे को जिन्दा होने का अहसास करा जाता है।
हर सुबह छज्जा उम्मीद भरी निगाहों से मुझे देखने लगता। और जब मैं अन्न के कुछ दाने छज्जे पर बिखेर देता तो फिर वही उम्मीद भरी नज़रें आसमान की ओर उठ जातीं। बेख़बर पंछी आता, दाना चुगता, गाता, और उड़ जाता । फिर देर तक छज्जे पर एक सुकून भरी शान्ति रहती, के जैसे दिन का एक सबसे जरूरी काम निबटा कर कोई ऊंघता हो, नये कल की तयारी में।
हफ्ते भर पहले ही इस उम्मीद पे रंग आया था जब पंछी अपने नये साथी को लाया था। एक और नन्हा पंछी, चंचल, कर्कश, जिन्दा। दोनों देर तक चौंच लड़ाते रहे। बंजर जमीन पे जैसे बेल फूट आई थी; छज्जे में भी बगिया बनने की चहा भर आई थी। लेकिन, फिर उस रोज से जोड़े ने मुड कर नहीं देखा, शायद नये साथी को मुंडेर नहीं भाई थी। छज्जा बूढा जो हो गया है। मेरी तरह!
इस से पहले भी उम्मीदे तो टूटी कई हैं, पर तोड़ने से पहले उम्मीद को दोगुना करने की ये रीत नयी है।
उम्र, बढ़ कर, एक दौर में जिस्म को पत्थर कर देती है। तब धड़कन की आवाज़ सुनने के लिए भी किसी और के दिल की जरुरत पड़ती है। चेहरा स्याह, जिस्म सुन्न, ढूंढता जिन्दा होने का अहसास है। शायद इसी लिए छज्जा उदास है।
-पुलस्त्य
पर, मौसम तो हर बार बदलता है ये उदासी पहले नहीं देखी। ये उदासी साथी के खोने की लगती है। कई दिन से बेसुरा पंछी नहीं आया है। गीत जो रोज गाता था, नहीं गाया है। न जाने कितने बरसों से नन्हा हर रोज दाना चुगने आता है, गीत गाता, कुछ वक़्त िबताता, उड़ जाता है। कर्कश अावाज में न जाने क्या गाता, पर छज्जे को जिन्दा होने का अहसास करा जाता है।
हर सुबह छज्जा उम्मीद भरी निगाहों से मुझे देखने लगता। और जब मैं अन्न के कुछ दाने छज्जे पर बिखेर देता तो फिर वही उम्मीद भरी नज़रें आसमान की ओर उठ जातीं। बेख़बर पंछी आता, दाना चुगता, गाता, और उड़ जाता । फिर देर तक छज्जे पर एक सुकून भरी शान्ति रहती, के जैसे दिन का एक सबसे जरूरी काम निबटा कर कोई ऊंघता हो, नये कल की तयारी में।
हफ्ते भर पहले ही इस उम्मीद पे रंग आया था जब पंछी अपने नये साथी को लाया था। एक और नन्हा पंछी, चंचल, कर्कश, जिन्दा। दोनों देर तक चौंच लड़ाते रहे। बंजर जमीन पे जैसे बेल फूट आई थी; छज्जे में भी बगिया बनने की चहा भर आई थी। लेकिन, फिर उस रोज से जोड़े ने मुड कर नहीं देखा, शायद नये साथी को मुंडेर नहीं भाई थी। छज्जा बूढा जो हो गया है। मेरी तरह!
इस से पहले भी उम्मीदे तो टूटी कई हैं, पर तोड़ने से पहले उम्मीद को दोगुना करने की ये रीत नयी है।
उम्र, बढ़ कर, एक दौर में जिस्म को पत्थर कर देती है। तब धड़कन की आवाज़ सुनने के लिए भी किसी और के दिल की जरुरत पड़ती है। चेहरा स्याह, जिस्म सुन्न, ढूंढता जिन्दा होने का अहसास है। शायद इसी लिए छज्जा उदास है।
-पुलस्त्य
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