तुझको याद मैं इस तरह कर रहा हूँ
के क़तरा क़तरा हर रोज मर रहा हूँ,
तेरी यादों के मज़ार पर, बिना नागा
टुकड़ो में खुद को अदा कर रहा हूँ ।
हर रात मौत की परी ख्वाब में आती है
ले आगोश में ग़म मिटाने को लुभाती है
न जीना पड़े बेबसी के और चार दिन
अब तो हर दम यही दुआ कर रहा हूँ ।
-पुलस्त्य
के क़तरा क़तरा हर रोज मर रहा हूँ,
तेरी यादों के मज़ार पर, बिना नागा
टुकड़ो में खुद को अदा कर रहा हूँ ।
हर रात मौत की परी ख्वाब में आती है
ले आगोश में ग़म मिटाने को लुभाती है
न जीना पड़े बेबसी के और चार दिन
अब तो हर दम यही दुआ कर रहा हूँ ।
-पुलस्त्य
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