Saturday, 9 August 2014

तू

तू क्या है ? कुछ भी तो नहीं ! 
तू घटा नहीं, तू हवा नहीं, तू फ़िज़ा भी नहीं,
ये सब तो मेरे ख़्याल हैं । इस दिल का बुना हुआ वबाल हैं ।

इन आँखों में है तो तू एक ख्वाब है !
जुस्तजु है मेरी साँसों में, तो नाम तेरा गुलाब है,
न लड़खड़ाएं ये कदम मेरे अगर, तो तु कहाँ की शराब है ।

मेरी दीवानगी पे मेरा बसर नहीं !
जवानी के दौर में शायद, सुकून-ऐ-दिल मयसर नहीं,
न उछले रगों में मेरा लहू तो, तू वो शय है जिसमे  कोई असर नहीं ।

मेरे जूनून ही से उठी तेरी रानाई है,
मेरी बंदगी के असर ही से क़ायम तेरी खुदाई है 
न लूटा एक जरा सी बात पर, फ़क़त मेरा ईश्क़ ही बस तेरी कमाई है ।

-पुलस्त्य


वबाल- Problem
जुस्तजु- Desire
बसर- Control
रानाई- Beauty 
बंदगी- Devotion 

No comments:

Post a Comment