Thursday, 28 June 2018

कवि की निजी पीड़ा और पाठक:


रुदन और क्रंदन दोनो पीड़ा व विवशता के समागम की ही उत्पत्ति हैं, बस शब्द का अंतर  क्रंदन का दर्जा ऊँचा कर देता है, क्यूँकि रुदन में शब्द नहीं होता।

और कवि अभ्यासी क्रंदन करने वाला नहीं तो और क्या है! पाठक यह जानते हैं। कविता में यूँ भी अक्सर यह पता करना मुश्किल है की इसमें वर्णित दर्द  निजी है या बस देखा हुआ।ऐक सुघड़ कवि की निशानी है इस फ़र्क़ को छिपा लेना, और पर-पीड़ा को भी निजी सा अभिव्यक्त करना।

वैसे पीड़ा अनुभव की तीव्रता का प्रत्यक्षता से गहरा सम्बन्ध है। परोक्षता से पीड़ा का अनुभव क्षींण होता है।फिर कविता में तो शब्द प्रयोग से जन्मी दूरी की परोक्षता के साथ साथ किसी और का अनुभव प्रयोग की परोक्षता भी सम्भव होती है। अतः कथा मे व्यथा सुन कर रचनाकार की पीडा बांटने कोई नहीं निकल पड़ता।

यूँ भी कवि, अपनी या परायी, किसी की भी हो पीड़ा को कविता रूप में बाज़ार में बेचने तो आता ही है, धन ना सही प्रसिद्धि और मान के लिए। और बाज़ार में  जूता देखा जाता है किस की खाल खिंची जूता बनाने में कौन पूछता है। भाव जूते से जूता मिला कर तय होता है, रंग, संरचना, कारीगरी के पैमाने पर, जिसकी खाल खिंची वो कितना तड़पा मानकों में से ऐक नहीं है। वैसे भी खाल खिंचने की तड़प का जूते की उत्कृष्टता से कोई सम्बन्ध नहीं है चाहे वो कारीगर की अपनी खाल से ही क्यूँ ना बना हो, उसे तो बस कारीगरी का ही मोल मिलेगा।

कवि का दर्द इस लिये है की कभी कभी भावावेश में अपनी ही खाल का जूता लेकर बाज़ार में आ बैठता है और अतिरिक्त मूल्य की उम्मीद करता है। वस्तु सत्य यह है की कवि की पीड़ा का कारण कविता की उत्पत्ति की सम्भावना को बढ़ाना नहीं था, बल्कि कविता तो मरहम बन कर आयी, और मरहम को बाज़ार में बेचने कौन जाता है और वो भी इस भावना के साथ की इस मरहम को पाने में मैंने बहुत दर्द झेला?

किसी की निजी डायरी या आत्महत्या पत्र की दो दुख भरी पंक्तियाँ व्यक्ति विशेष के मर्म से ऐकाकार कर देती हैं, चाहे वे अति साधारण संरचना में ही क्यूँ ना हों, क्योंकि वे निजी हैं। कविता निजी नहीं होती। ऐक वशिष्ठ रूप में संरचना का प्रयास व किसी भी रूप में प्रकाशन की अभिलाषा निजीपन को ख़त्म कर देते है, ऐक प्रकार से बाज़ार में ले आतें हैं, अन्य कवियों से मुक़ाबिल करते हैं, प्रतिस्पर्धा में उतारते हैं। और प्रतिस्पर्धा में प्रदर्शन का महत्व है, दर्शक उसी का आनन्द उठाने आते हैं, त्यारी का कष्ट और तरीक़ा कोई नहीं पूछता, प्रतिस्पर्धी अर्थात अन्य कवि पूछें तो पूछें।

फिर, पीड़ा की कविता लोग परमार्थ के लिये नहीं पढ़ते। परोक्ष रूप मे दर्द भाव का आनंद लेने के लिए पढ़ते हैं। इससे उन्हें या तो स्वयं की  उत्तम स्तिथि पर अतिरिक्त संतोष प्राप्त होता है या फिर अपनी बद अवस्था में भी ऐक प्रकार का मनोवेज्ञानिक सहयोगी मिलने का अनुभव होता है। पाठक को कवि की पीडा समझने हेतु समाज सेवी का बोझ देना उचित नहीं है।

कवि की पीड़ा उसकी उर्वरा भूमि है पाठक को तो बस उसकी उपज का मूल्य तय करना है। पीड़ा की उर्वरा भूमि का वैसे भी कोई ख़रीदार नहीं होता, यह तो गले पड़ती है। इस पर जो उगता है उसे परोसने लायक़ जो बनाए उसे कवि कहते हैं।

फिर कोई कवि अपनी अति संवेदनशीलता से दूसरे की पीड़ा को भी बँटाई पर ले सकता है।

-पुलस्त्य

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