Thursday, 18 April 2019

Chhoti si Nadi

कल शाम प्रोमोनेड़ पर,
तुम्हारे साथ चलते चलते,
पर्वत था मैं, और तुम
ऐक चंचल छोटी सी नदी,
छू गयी मगर जब तुम्हारी कलाई
अनजाने में मेरे हाथ से,
रगों मैं दौड़ पड़ा लहूँ,
फूटीं कुछ कपोले
पत्थर के भी ख़्वाब में,
और, आँखो मैं वो तुम्हारी जाने क्या था
रूप, जवानी या अलहड़पन से बना था
या फिर उमड़ते जीवन का नशा था
झूम उठे थे क़दम मेरे भी
मैं ज़िंदा हूँ अभी, मैं ज़िंदा हूँ अभी
पल भर तो लगा था।
-पुलस्तय

No comments:

Post a Comment