Friday, 5 February 2016

ख़ुदा

मिल जाय अगर ये नूर तेरी आँखों का
तुझे बना के खुदा अपनी नज़रों में बसा लूँ ।

मिले अगर सुलगती शबनम तेरे होंठों की
रख लूँ मेरी ज़ुबान पे मौत से निजात पा लूँ ।

मिलजाए अगर नरमीयां तेरी ज़ुल्फ़ों की
उफ ना करूँ तल्खियाँ जमाने भर की निभा लूँ ।

दे सके अगर तू ख़ुश्बू ये तेरे जिस्म की
बन जाऊँ तेरा जोगी, मल लूँ मेरे तन पे लगा लूँ ।

मिल जायें घेरे तेरी बाहों के अगर तो
इनमे मर जाऊँ अपनी रूह को जन्नत में पनाह दूँ ।

अगर नहीं क़ाबिल मेरी इबादत तेरी नेमतों के तो भी ,
बराये मेहेरबानी उठा के नज़र मुझे देख लेना कभी
ताकी ऐक आख़िरी बार मैं भी जशने ज़िन्दगी मना लूँ ।

-पुलस्तय

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