Friday, 5 February 2016

Sharab ke naam....

जब से तुझे खुदॉ बनाया
इबादत का ये कायदा आम हो गया,
"पीना" है नमाज मेरी
शराब मेरा दीन-ओ-ईमान हो गया ।

बेहाल हुआ जबीं घिसते घिसते
तो मेरे हसीं खुदा को कुछ रहम आया है,
नूर अपनी आँखों का
भर के इस बोतल में मुझे भिजवाया है ।

नशा शराब का ईश्क़ से है
अर्क पे लगा हर इल्जाम बेमानी है
न दिखे मेहबूब जिसे पीकर
वो मय, मय नहीं रंगीन पानी है  ।

-पुलस्तय

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